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बदलती आस्थाएं या लोकतान्त्रिक धोखा...


बदलती आस्थाएं या लोकतान्त्रिक धोखा...



राजनीति में आस्था परिवर्तन एक ऐसी बीमारी की तरह है जो राजनीति के जन्म से ही चली आ रही है। आस्था परिवर्तन का यह रोग किसी चुनाव के वक़्त महामारी का रूप धारण कर लेता है और राजनीतिक मंच के आस्था परिवर्तन करने वाले यह कलाकार इस परिवर्तन को लेकर ऐसे ऐसे तर्क गढ़ते हैं कि आप सुनकर हैरान रह जायेंगे। राम कृपाल यादव, जगदम्बिका पाल जैसे नेताओं के आप कुछ वक़्त पहले के बयान याद कर लीजिये और उनके वर्तमान बयानों से तुलना कीजिये … आपके मन में यह सवाल ज़रूर चकराएगा कि किसी व्यक्ति की विचारधारा के दो सामानांतर पहलुओं में इतना भयानक विरोधाभास कैसे हो सकता है ? या तो वो पहले गलत थे या फिर अब गलत हैं। लेकिन इस सवाल का जवाब देने की हिम्मत किसी राम कृपाल या जगदम्बिका पाल में नहीं मिलेगी, क्योंकि इस सम्भावना से तो वह भी इन्कार नहीं कर सकते कि अगले चुनाव  तक उनकी आस्था फिर बदल सकती है और दो विपरीत विचारधाराओं को अपना कर वह दोनों  बार सही होने  का दवा तो कर नहीं सकते।
देखा  जाये  तो यह आस्था परिवर्तन उस  जनता के साथ सीधा धोखा होता है जो आपको अपना मत देकर चुनती है लेकिन इस तथ्य का एक रोचक पहलू यह भी है कि चुनाव के वक़्त सांप की केंचुली की तरह अपना पिछला दल त्याग कर नए दल को धारण करने वाले नेता इस मामले में उतने गुनहगार नहीं होते जितने चुनाव से पहले ही दल बदल लेने वाले मान्नीय या चुनाव के बाद गठबंधन के नाम पर किसी भी दल के साथ खड़ी हो जाने वाली पार्टियां होती हैं।  
कुछ उदाहरणों पर गौर कीजिये ... गुजरात में कांग्रेस और बीजेपी की सीधी टक्कर होती है या बिहार में राजद और जद-यू की। अब गुजरात में जिसने भी कांग्रेस को वोट दिया -- जिनमे मुख्य रूप से मुस्लिम हैं और किसी प्रत्याशी को विजेता बनाया तो इसका मतलब यह होता है कि उन्होंने भाजपा को नकारा है और उसके प्रत्याशी को हराने के लिए आपको वोट दिया है, लेकिन जीतने के बाद अगले चुनाव से पहले ही आप उसी भाजपा का हाथ थाम लेते हैं तो यह उस क्षेत्र की जनता के साथ सीधा धोखा है या नहीं ? इसी तरह जब बिहार में लोग किसी राजद उम्मीदवार को चुनाव जितवाते हैं तो इसके भी दो पहलू होते हैं, पहला तो यह कि लोगों ने राजद की दलीय विचारधारा को स्वीकार किया और दूसरे यह कि उन्होंने जद यू-भाजपा की दलीय विचारधारा को निरस्त किया और उसके प्रत्याशी से असहमत रहे। तभी तो राजद का प्रत्याशी जीता और यही जीता हुआ प्रत्याशी कल को उस जद यू से जा मिले जिसे चुनाव में उसके क्षेत्र की जनता ने नकारा था तो यह उस इलाके के लोगों के साथ धोखा है या नहीं ?
इसी पैटर्न पर राजनितिक दल भी लोगों के साथ धोखा करते हैं। मान लीजिये आप कट्टर मुस्लिम हैं और भाजपा को हराना चाहते हैं। आपके क्षेत्र में सीधी टक्कर बसपा और भाजपा से है और आप अपने पूरे समाज के साथ सिर्फ इसलिए बसपा को वोट करते हैं कि भाजपा को हरा सकें और हाथी सवार जीत भी जाता है लेकिन चुनाव के बाद पता चलता है कि नए समीकरणों के साथ बसपा अब भाजपा को समर्थन दे कर उसकी सरकार बनवायेगी तो इसका मतलब तो यही हुआ कि इन-डायरेक्ट वे में आपका वोट भाजपा को ही चला गया और आपके भाजपा को हरा चुकने के बाद भी भाजपा ही जीत गयी।
इसी तरह मान लीजिये, आप कट्टर भाजपा समर्थक हैं और किसी भी सूरत में कांग्रेस की सरकार बनते नहीं देखना चाहते और अपने क्षेत्र में कांग्रेस को हराने में कोई कसर नहीं उठा रखना चाहते लेकिन आपके क्षेत्र में जीत के लिए सीधी टक्कर कांग्रेस और सपा में है तो आप अपना भाजपा प्रेम किनारे रख कर सपा के पक्ष में सिर्फ इसलिए खड़े हो जाते हैं कि कांग्रेस को हरा सकें और ऐसा करने में कामयाब भी रहते हैं लेकिन चुनाव के बाद जब सरकार बनाने की नौबत आती है तो यही सपा कांग्रेस के समर्थन में खड़ी हो कर उसकी सरकार बनवा देती है तो ऐसे में सवाल उठता है कि आपकी मेहनत किस काम आयी -- जो आप नहीं चाहते थे, अपने क्षेत्र में आपके सफल होने के बावजूद प्रकारांतर से वही तो हुआ। क्या यह धोखा नहीं ?
इससे बचने के दो ही उपाय हैं। पहला तो यह कि अगले चुनाव से पहले दल बदल करने वाले प्रतिनिधि के लिए राईट टु रीकॉल का प्रावधान होना चाहिए और तत्काल उसकी सदस्य्ता रद्द होनी चाहिए। दूसरे यह कि जो दल अभी NDA और UPA के गठबंधनों से अभी मुक्त हैं, उन्हें चुनाव से पहले अपनी स्थिति लिखित रूप से स्पष्ट करने का प्रावधान भी होना चाहिए कि समीकरण चाहे जो भी हों पर वह किस दल के साथ नहीं जायेंगे और किस दल के साथ जा सकते हैं ताकि मतदाताओं में भ्रम की स्थिति न रहे कि सपा को वोट करने के बावजूद उनका वोट कांग्रेस को पहुँच जायेगा या बसपा को वोट करने के बावजूद उनका वोट घूम फिर कर उसी भाजपा के पक्ष में पहुँच जायेगा जिसे हारने के लिए उन्होंने बसपा को वोट किया।

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