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आपका ऊँट किस करवट बैठेगा?




आपका ऊँट किस करवट बैठेगा?


लो जी, चुनावी  बेला आ गयी -- अब बड़े बड़े दिलचस्प खेल शुरू हो जायेंगे, जिन्हें हम राजनीतिक उठापटक कहते हैं। एक ज़माना था, जब चुनाव कम खर्च में बैनरों, पोस्टरों, और जनसभाओं के माध्यम से लड़े जाते थे लेकिन बदलते दौर में इस खेल का स्वरुप भी बदल चुका है। अब मीडिया इस खेल का प्रमुख हथियार बन चुका है, चाहे वह प्रिंट मीडिया हो, इलेकट्रोनिक मीडिया, या सोशल मीडिया। कई समर्थ और घाघ प्रवृत्ति के लोग इसे अपने पक्ष में मैनेज कर लेते हैं और अपनी नैया पार लगा  ले जाते हैं और कई इस व्यूह के कच्चे खिलाड़ी साबित होते हैं और बैनरों, पोस्टरों, जनसभाओं के सहारे सार्थक लड़ाई लड़ने के बावजूद मुंह के बल गिरते हैं।  
मीडिया नाम के इस तत्व को कैसे मैनेज किया जाता है इसका अंदाज़ा आप ऐसे लगा सकते हैं कि जब आप बस-ट्रेन में यात्रा-रत हों तो अपने सह-यात्री के यह कहने पर कि पूरे देश में मोदी की लहर चल रही है -- उससे पूछें कि यह बात उसे कैसे पता चली? क्या उसने स्वयं पूरे देश में जगह जगह घूम कर लोगों से यह बात जानी है? जवाब मिलेगा कि उसकी क्या ज़रुरत है, हर टीवी चैनल बता रहा है, अख़बार बता रहे हैं। अब सोचने वाली बात है कि इन्हें किसने बताया … सर्वे करने वाली कुछ कंपनियों ने … तो आप उन कंपनियों से पूछिए कि उन्होंने देश भर में चलती हवा के बारे में कैसे जाना? कितने लोगों से पूछा और क्या इस बात का कोई रिकॉर्ड है कि लोगों ने ऐन वही बताया जो वह कह रहे हैं तो आपको जवाब में एक ठेंगा लहराता हुआ दिखेगा। मतलब यह कि जो यह लोग कह दें बस वही अंतिम सच है जिस पर उंगली नहीं उठायी जा सकती। कहने का मतलब यह कि ओपिनियन पोल लोगों का ओपिनियन जान्ने के लिए नहीं होते बल्कि यह लोगों का ओपिनियन बनाने के लिए होते हैं और सत्य वो ही नहीं होता जो वाकई सत्य हो -- सत्य वो भी हो सकता है जो मीडिया वाले चीख चीख कर आपको बताएं और आप उसे सत्य मान कर दूसरे लोगों को बताना शुरू कर दें कि समूचे देश में मोदी की लहर है -- यह लहर पहले भले सिर्फ टीवी चैनलों, अख़बारों पर ही अस्तित्व में आयी हो लेकिन इस लहर के व्यापक प्रचार प्रसार के बाद जब लोगों का ओपिनियन मैनिपुलेट कर दिया जाता है तब फिर वाकई लहर न होते हुए भी लहर हो ही जाती है। 
मेरे लोकसभा क्षेत्र से एक आजूद प्रसाद इस बार इलेक्शन में किस्मत आज़मा रहें हैं।  वे प्रसन्न हैं और जीत के प्रति आश्वस्त भी। क्षेत्र में उनके पोस्टर, बैनर, होर्डिंग, फ्लेक्स भले कम दिखायी दें लेकिन तूफानी दौरे और ढेरों जनसभाएं करते हैं और उनकी ख़बरों से अख़बारों के स्थानीय पन्ने गुलज़ार रहते हैं और यूँ क्षेत्र में उनकी हवा का साफ़ पता चलता है जबकि पड़ोस के चुनावी उम्मीदवार माजूद प्रसाद उतना ही करके अखबारों के पन्नों से लगभग गायब रहते थे और इस बात से काफी मायूस रहते कि उनकी हवा ही नहीं बन पा रही।
उन्हीने आजूद प्रसाद के पीछे भेदिये लगाये और उनके नेटवर्क ने जल्दी ही आजूद प्रसाद की हवा का कारण जान लिया। तत्पश्चात, माजूद प्रसाद ने भी आजूद प्रसाद के नक़्शे कदम पर चलते हुए अपने क्षेत्र के अख़बार टीवी से जुड़े सभी लोगों को एक खास दावत पर आमंत्रित किया, उनकी पसंद के मुताबिक उन्हें ट्रीट किया, गिफ्ट दिए, और उनमें अगर किसी की भी ऐसी समस्या थी जो उनसे हल हो सकती तो उसके साथ आगे आगे चले।  चुनाव तक सभी का खाना पीना अपने घर ही मैनेज कर दिया। नतीजे में कई महोदय तो पूरे वक़्त के लिए ही उनकी टीम की तरह उनके साथ हो लिए और देखते देखते अख़बारों के स्थानीय पन्ने उनकी खबरों से गुलज़ार होने लगे और अब वे प्रसन्न हैं कि क्षेत्र में उनकी भारी हवा चल रही है जो दूसरे भी देख सकते हैं।
लब्बोलुआब यह कि अपने क्षेत्र में पत्रकारिता के पेशे में ऐसे कई लोग हो सकते हैं जो चुनावी मौसम में उपकृत होने के लिए आपका मुंह तक रहे हों  और आप हैं कि उपकार की क्षमता होते हुए भी इधर उधर उपकारों को व्यर्थ कर रहे हैं। सही लोगों को उपकृत कीजिये तभी तो आपके उपकार सार्थक होंगे और क्षेत्र में आपकी हवा दिखलाई पड़ेगी। लोग बिकने के लिए तैयार बैठे हैं और आप खरीदने के सहज ज्ञान में भी फिसड्डी साबित हो रहे हैं। ऐसा नहीं है कि पत्रकारिता के दो मूल तत्व ईमानदारी और निष्पक्षता कहीं विलुप्त हो चुके हैं। वे आज भी अपने मूल स्थान पर कायम हैं लेकिन यह आपकी ऑफर पर निर्भर करता है कि वह कब तक अलमारी में तहा कर रख दिए जायेंगे। अपने मनमाफिक सौदा पटने पर बिरादरी के लोग यह तर्क दे सकते हैं कि उन्होंने पत्रकारिता के मूल सिद्धांतो का कोई स्थायी परित्याग थोड़े न किया है बस थोड़े वक़्त के लिए उन्हें छुट्टी पे ही तो भेजा है।  
अब अगर कोई केजरी या शिंदे पलट कर मीडिया पर उंगली उठा दे तो समूचा मीडिया ऐसे तिलमिला कर प्रतिक्रिया देता है जैसे कि पत्रकारिता के पेशे से जुड़े लोग सीधे स्वर्ग से धरती पर अवतरित होते हैं, उन्हें राजा हरिश्चंद्र का सर्टिफिकेट प्राप्त होता है और वे सारे युधिष्ठिर के अवतार में रूप में जन्मे हैं। वे पंजे  झाड़ कर केजरी और शिंदे के पीछे पड़ जाते हैं लेकिन अपने गिरेबान झाँकने की टूटी फूटी और दिखावे की कोशिश करना भी ज़रूरी नहीं समझते कि उनके पेशे में भी जो लोग हैं वो भी इंसान ही हैं जो स्वाभाव से आज के इस दौर में उतने मज़बूत चरित्र के नहीं होते कि अपने दस हित साधने का प्रलोभन सामने देख कर भी ईमानदारी और निष्पक्षता की कसौटी पर खरे ही उतरें … और यह सोचने की ज़हमत करें कि उनके लोग भी ऑपरेट हो सकते हैं।
बहरहाल, शंखनाद हो चुका है, बिसात बिछायी जा चुकी है और मोहरे सज चुके हैं -- अब यह आपकी योग्यता पर निर्भर है कि आपका ऊँट किस करवट बैठता है।

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