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आस्था के साइड इफ़ेक्ट

आस्था के साइड इफ़ेक्ट  


धर्म जीवन के लिए अनिवार्य है, यह एक शाश्वत सत्य है। आस्था इंसान को बुरा बनने से रोकती है और अच्छा बनने के लिए प्रेरित करती है। यदि किसी से उसकी आस्था छीन ली जाए तो उसके डर का कारण ख़त्म हो जायेगा और उसे बुरे कर्म करने से या संसार का शायद सबसे बुरा इंसान बनने से भी गुरेज़ नहीं होगा और यही विचारधारा अगर हर किसी की हो जाये तो संसार को नरक बनते भला कितना समय लगेगा। यह इस बात का तार्किक प्रमाण है कि हमारे लिये धर्म और आस्था की आवश्यकता और अनिवार्यता क्यों है... लेकिन यहाँ ध्यान देने लायक बात यह है कि यदि आपकी आस्था इतनी गहरी हो जाए कि वह जड़ता और कट्टरता की सीमायें छूने लगे तो यह भी अनास्थावान् होने जितना ही खतरनाक है। दुर्भाग्य वश दुनिया के उन हिस्सों में, जहां हिन्दू और मुस्लिम रहते हैंऐसा  ही हो रहा है। आजकल व्हाट्सप्प, फेसबुक पर मुल्ला टाइप युवाओं के ऊलजुलूल, अतार्किक, गलत जानकारियों से लैस, मगर धार्मिक कट्टरता से भरे संदेशों और बातचीत का अनुपात बढ़ता ही जा रहा है। यह धार्मिक कट्टरता मुसलमानों में किसी और धर्म या सम्प्रदाय के मुकाबले कई गुना ज्यादा पायी जाती है। भले हम हिन्दुस्तान में रहने वाले मुसलमान हिन्दुओं के एक बड़े तबके पर साम्प्रदायिक होने का इलज़ाम क्यों लगाते रहे हों-- हमें निष्पक्ष होकर थोड़ा अपने जीवन में भी झांकना चाहिए कि हमारी आस्था हमें कहां ले जा रही है।   
आज अरब और अफ्रीका से जुड़े वे देश जहां ठीक ठाक तादाद में मुसलमान रहते हैं या शासकों की भूमिका में मुसलमान ही हैं, वहां गृह युद्ध  जैसे हालात बने हुए हैं। आई. एस., बोको हराम, अल शबाब जैसे  मज़हब का सहारा लेकर आतंकवाद फैलाने वाले, इस्लाम के नाम पर ईसाईयों, यहूदियों, यज़ीदियों, शियाओं एवं अन्य गैर  मुस्लिमों का क़त्लेआम कर रहे हैं, उनकी बस्तियों को ख़ाक कर रहे हैं, उनके खिलाफ बर्बरता की सारी हदें पार कर रहे हैं। कई असहमत मौलाना सऊदी अरब में स्थापित शान्ति एवं न्याय की दुहाई दे सकते हैं पर वे यह भूल जायेंगे कि यह जगह इस्लाम के अनुयाइयों के लिए लगाव और आस्था का मर्क़ज़ है और जहां कोई भी अतिवादी कार्रवाई ऐसे लोगों को सीधे इस्लाम का दुश्मन साबित कर देगी। इसीलिये यह मुल्क़ ऐसे किसी सीधे संघर्ष से बचा हुआ है वरना आसपास के मुल्कों पे नज़र डालेंगे तो लगभग सभी संघर्ष और अस्थिरता  के शिकार नज़र आएंगे।
यह धार्मिक कट्टरता हमारे आसपास भी उसी मात्रा में मौजूद है। आप अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश को देख सकते हैं जहां घोषित-अघोषित रूप से इस्लाम राष्ट्रीय धर्म है। यहां धर्म के नाम पर  कितनी मारकाट होती है, बम धमाके और बर्बादियाँ होती हैंयह आज की ग्लोबलाइज़्ड  दुनिया में किसी से छुपा नहीं है। कहने को भले इन देशों में क़ानून है  पर इनके समाज के अनपढ़, कम पढ़े लिखे, रूढ़िवादी और धार्मिक कट्टरता से ओतप्रोत लोग झुंडों में यह फैसले करते हैं कि वहां के लोगों को क्या करना है क्या नहींसही गलत, न्याय-अन्याय की परिभाषा इनके हिसाब से तय होती है। यहां दूसरे सभी धर्मानुयायी महत्वहीन एवं दोयम दर्जे का जीवन व्यतीत करते हैं और उनके साथ भेदभाव और असहिष्णु व्यवहार एक आम बात है, हलाकि इनके उलट भारतीय मुसलमान इस बात के लिये फख्र कर सकते है कि देश में अस्सी प्रतिशत से ज्यादा हिन्दू आबादी होते हुए भी भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं घोषित हुआ, बल्कि यहां सभी धर्मों को सामान अधिकार मिला हुआ है। हमारी रहनुमाई का दावा करने वाले राजनेता और धार्मिक नेतृत्वकर्ता इस फख्र को अनुभव करने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित होते हैं।
बान्नवे के कारसेवा वाले दौर में धार्मिक कट्टरता अपने चरम पर थी, लेकिन बाद के वर्षों में भाजपा के पराभव में यह कमज़ोर पड़ती गयी लेकिन पिछले आमचुनाव में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा की ज़बरदस्त जीत के साथ ही यह कट्टरता फिर मुख्यधारा में गयी है। अब कोई दिन और कोई छोटा मोटा मुद्दा भी वंचित नहीं रहता जब इस किस्म की कट्टरता को बढ़ावा देने वाले लोग अख़बार और टीवी की सुर्खियां बनते हों।
हलाकि इन्हें भाव देकरइनकी क्रियाओं को प्रतिक्रियाविहीन कर देने से इनके ज़हर के प्रभाव को सीमित किया जा सकता था और इन्हें मिलने वाला समर्थन का दायरा भी सिमटता जाता जैसे मस्जिद विध्वंस के बाद के दौर में हम देख चुके हैं कि  भाजपा, आर. एस. एस. या उसके अनुषांगिक संगठनों से जुड़े फायर ब्रांड कहे जाने वाले नेता कैसे महत्वहीन और अप्रासंगिक होते चले गए थेलेकिन मुसलमानों की ठेकदारी करने वाले रहनुमाओं के पास भी तो यही मौका है, अपने चेहरे चमकाने का, अपनी दुकाने चलाने काभला वे यह मौका कैसे छोड़ सकते हैं।
ऐसे माहौल में जब साधु साध्वियों के प्रवचनों से समाज में अलगाव की लकीरें खिंच रही हैं  तो उन लकीरों को और गाढ़ा करने के लिए कुछ मदनी टाइप मौलाना जमीयते उलेमा का झंडा लेकर निकल पड़े हैंमुसलामानों को अच्छा बुरा समझाने। यही वक़्त तो मौजू है उनकी दुकानदारी चमकाने कादूसरी तरफ ओवैसी बंधु हैं जो किसी भी तौर पर साध्वी प्राची, साक्षी महाराज, प्रवीण तोगड़िया या सुब्रह्मनियम स्वामी से कम ज़हरीले नहीं हैं लेकिन धार्मिक कट्टरता  हमारी आँखों पर ऐसी चढ़ी है कि हमें सच नहीं दिखताअगर आपको लगता है कि अपनी क़ौम के लिए बोलने वाले ओवैसी बंधु सही हैं तो फिर अपनी क़ौम के लिए बोलने वाले प्राची, सिंघल, तोगड़िया आदि गलत कैसे हो गये? अपनी क़ौम के लिए आवाज़ उठाने वाले ओवैसी बंधु आपको शेर लगते हैं तो फिर अपनी क़ौम के हक़ में झंडा उठाने वाले हिन्दू लीडर ज़हरीले और खतरनाक क्यों?
अगर अपने अस्तित्व की अलग पहचान कायम करने या उसकी मज़बूती का लक्ष्य भी है तो वो भी मुख्यधारा में रहते हुए सबके साथ चल कर ही साधा जा सकता है लेकिन कोई मुसलमानों की पार्टी बना कर एक भी तीर नहीं मारा जा सकताबावजूद इसके कभी मुस्लिम लीग, कभी यू. डी. एफ., कभी ए.आई.एम.आई.एम., पीस पार्टी, . यू. डी. एफ. जैसी  पार्टियां मज़हब के नाम पर धर्मांध मुसलमानों को छलने जाती हैं। ऐसा नहीं है कि यह जो धर्म के नाम पर भड़काऊ बयानबाजी करके अपनी क़ौम का हितैषी होने का दम्भ भरते हैं इन्हें वाकई क़ौम की फ़िक्र है। फ़िक्र होती तो अपने तबके के वंचित, पीड़ित और शोषित लोगों के बीच जा कर उनका दर्द बांटते, उनके जीवन स्तर को  सुधारने  की कोशिश करते। किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर आग उगलने वाली साध्वी प्राची फसलों की बर्बादी के बाद मौत को गले लगाते कितने किसानों के बीच उनका दर्द बांटने पहुंची? मुसलमानों के परम हितैषी ओवैसीज़ कमज़ोर, वंचित,गरीब मुस्लिमों की कौन सी स्कूलों, अस्पतालों के ज़रिये सेवा करने की कोशिश करते हैंकौन सा ऐसा इदारा उन्होंने कायम किया है जो समाजसेवा करता होधर्मार्थ कार्यों से लगा होगौर से देखेंगे  तो खुद समझ पाएंगे की इन्हें सिवा राजनीती करने के और कुछ नहीं करना, लेकिन समझने की कोई ईमानदार कोशिश तो हो।
इतने पढ़े लिखे ओवैसी बंधु इतना तो समझते ही होंगे कि अस्सी प्रतिशत हिन्दू आबादी वाले देश में वे मुसलमानों के नाम पर पार्टी बना कर लड़ने जायेंगे तो हैदराबाद जैसी तीन चार जगहों से ज्यादा नहीं जीत सकते लेकिन वे दो काम अपने एजेंडे के ज़रिये आसानी से कर सकते हैं ... सामाजिक न्याय या विकास जैसे मुख्य लक्ष्यों को दरकिनार कर सिर्फ इस्लाम के नाम पर  वोट दे डालने वाले लाखों अंधे बहरे मुसलमानों के वोट ख़राब कर सकते हैं और दूसरे इस क्रियात्मक पार्टीगत इस्लामिक एकता की प्रतिक्रिया में हिन्दुओं को एक होकर भाजपा को बढ़त बनाने का सुनहरा अवसर दे कर .. जैसा उन्होंने महारष्ट्र में किया। अपनी शानदार उपस्थिति  से न सिर्फ कांग्रेस-एनसीपी  का बंटाधार किया बल्कि सालों के वनवास के बाद बीजेपी -शिवसेना की सत्ता में वापसी भी करा दी। अब उनका  लक्ष्य देश के उन सभी राज्यों में, जहां मुस्लिम वोट अच्छी तादाद में हैंउनके वोटों को ठिकाने लगा कर भाजपा को बढ़त बनाने का मौका देने से ज्यादा और कुछ हो भी नहीं सकता। इस सर्व-विदित तथ्य के बावजूद कि मुसलमान अपनी पार्टी बना कर दो चार सीटों से ज्यादा जीत हासिल नहीं कर सकतेफिर भी अपनी ब्रांड वैल्यू बढ़ाने के लिए कुछ लोग ऐसी कोशिशे करते रहते हैं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर आप समाज की मुख्यधारा से कट कर धर्म के नाम पर एक हो सकते हैं तो प्रतिक्रियात्मक रूप से हिन्दू भी एक हो सकते हैं जैसे उन्होंने पिछले आम चुनाव में करके दिखाया। फिर ऐसे समीकरणों के सहारे जो सरकार राज्य या केंद्र में बनती है वो आपको महत्वहीन कर सकती है, आपको दी जा रही सुविधाओं में कटौती या उन्हें ख़त्म कर सकती है, विशेषतया आपके खिलाफ इस्तेमाल हो सकने वाले टाडा, पोटा टाइप कानून बना सकती है और यह सब उसे करने का हक़ भी होता है क्योंकि विकास या सामाजिक न्याय के लिए तो उसने जनादेश पाया ही नहीं और आपको रोने चिल्लाने, हाय-हाय करने या सरकार को कोसने का भी कोई हक़ नहीं क्योंकि   आपने भी विकास, सामाजिक न्याय के मुद्दे देखे स्थानीय समीकरणबस मुसलमान होने के नाम पर वोट दिया तो यह शिकायत कैसी? अभी ओवैशी बंधुओं ने यह कारनामा महारष्ट्र में किया हैअभी बिहार, फिर यू. पी., बंगाल में करेंगे और फिर उन सभी जगहों पर जहां मुसलमान अच्छी तादाद में रहते हैं. खुद को मानसिक रूप से तैयार रखियेआपके भी  ‘वोवालेअच्छे दिनआने वाले हैं।

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