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आरक्षण की मांग या नूरा कुश्ती


आरक्षण की मांग या नूरा कुश्ती


अगर आर्थिक, शैक्षणिक, सामाजिक रूप से समृद्ध, सम्पन समुदाय आरक्षण की मांग पर यूँ उग्र हो जाये, जो कि व्यवहारिक नहीं तो कारण की खोजबीन की ही जाएगी कि कैसे हथियारों के साथ फोटो खिंचाने का शौक़ीन नौजवान सवा करोड़ पटेलों का हीरो बन गयाकैसे उसने पांच लाख लोगों की भीड़ एक जगह इकट्ठी कर ली, जो बगैर किसी सांगठनिक ढाँचे के संभव नहींअगर हम इस आंदोलन के पीछे किसी संगठन की सम्भावना तलाशें तो ऐसा एकमात्र संगठन RSS के रूप में ही दिखाई देता है जिसकी पैठ और पकड़ पूरे गुजरात में है। ये तय है कि एक अकेला युवक पूरे गुजरात    के  पटेलों को यूँ संगठित नहीं कर सकता मगर एक संगठन कर सकता है जिसके साथ दूर दराज के  हर क्षेत्र में भी उस समुदाय के लोग जुड़े हों। 
कुछ लोग इसके पीछे AAP या कांग्रेस  की सम्भावना भी तलाश कर सकते हैं लेकिन AAP का नेटवर्क गुजरात में इतना मज़बूत नहीं कि वो ऐसा आर्गनाइज्ड आंदोलन खड़ा कर सके, जबकि कांग्रेस ऐसी मांग पर पटेलों के आसपास भी दिख कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगी नहींवरना जो बचा खुचा वोट है वो भी हाथ से जाता रहेगा।  भाजपा का क्या है, किसी चुनाव के समय गुजराती अस्मिता के नाम पर की गयी प्रधानमंत्री की एक भावुक अपील पटेलों को फिर कमल खिलाने पर मजबूर कर देगी, रही सरकारी संपत्ति, जिसका नुकसान हुआ तो वो कौन सी किसी पार्टी या संगठन की थी, फिर से बन जाएगीबड़े लक्ष्य साधने के लिए छोटे हितों की बलि तो देनी ही पड़ती है। सवाल ये उठाया जा सकता है कि इसमें RSS या बीजेपी  का फायदा क्या हो सकता है?
इसके लिए हमे थोड़ा पीछे जाना होगा जब वो दौर था कि हर राजनितिक, प्रशासनिक पद पर, लगभग हर तरह की नौकरियों, संस्थाओं में सवर्णों, खास कर ब्राह्मणों का वर्चस्व हुआ करता था, नई भर्तियों  में भी खूब भेदभाव होता था और सवर्णों को  ही प्राथमिकता दी जाती थीफिर आरक्षण की वजह से हालात बदले, कभी तुच्छ और हीन समझे  जाने वाले पिछड़े, दलित आरक्षण के सहारे शिक्षा पाने लगे, नौकरियों में आने लगे, ऊंचे पदों पर पहुँचने लगे, पहले बी सी  प्रधानमंत्री का सफर तय करने में भले देवगौड़ा को पचास साल लग गए लेकिन सबसे ऊंची कुर्सी तक भी ये वर्चस्व टूटा।
ये वर्चस्व का टूटना ही समस्या थी, समाज के उन तबकों के लिए जो आर्थिक, शैक्षणिक, सामाजिक रूप से संपन्न थे और इस व्यवस्था के दायरे में नहीं आते थे। आज भी सवर्णो का बड़ा धड़ा इस आरक्षण के सख्त खिलाफ है। RSS या भाजपा, जहाँ सवर्णों का ही बोलबाला है,को  ये व्यवस्था कभी भी स्वीकार्य नहीं थीउन्होंने हमेशा आरक्षण का विरोध किया है लेकिन सत्ता के केंद्र तक पहुँचने के  बावजूद वे इसे सीधे सीधे ख़त्म नहीं कर सकते क्योंकि जो इस व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं, उनकी संख्या उनसे कहीं ज्यादा है जो इस व्यवस्था के लाभार्थी नहीं हैंऐसे किसी कदम का विरोध इतने व्यापक स्तर पर होगा कि उसे सम्भालना RSS के लिए संभव होगा भाजपा के लिए। क्या इस  दौर में, इस मक़ाम पर पहुँच के आरक्षण को यूँ सीधे सीधे ख़त्म किया जा सकता है?
जवाब है 'नहीं'… इसके लिए जनमत बनाना होगा और जनमत कैसे बनेगा... कोई कूटनीतिक रास्ता ही एकमात्र विकल्प है, जो इन आंदोलनों की आड़ में चोर दरवाज़े से तलाशने की एक कोशिश की गयी हैसम्भावना इसी बात की है कि राजस्थान में गुर्जरों को खड़ा करना, हरियाणा/पश्चिम यू पी  में जाटों को खड़ा करना  या गुजरात में पटेलों को खड़ा करनाये इसी लॉन्ग टर्म प्लान का हिस्सा है।
हो सकता है धीरे धीरे पटेलों, गुर्जरों, जाटों की तरह देश में जगह जगह आरक्षण की मांग को लेकर वो जातियां सर उठाने लगें और उग्र होने लगे  जो  आरक्षण की परिभाषा में फिट नहीं बैठतीइसी तरह लोग अपने तथाकथितहक़के लिए उग्र होने लगे तो इससे पैदा हुई अराजकता, पूरे समाज में एक व्यापक खीझ के रूप में सामने आएगी जहाँ भारतीय समाज दो फाड़ में बंटा दिखाई देगा, जिसमे एक तरफ तो आरक्षण का समर्थन करने वाले होंगे तो दूसरी तरफ वो लो जिनकी मांग होगी कि या तो सबको आरक्षण दो या इसे ख़त्म कर दोयही तो मुख्य लक्ष्य हैइन आन्दोलनों के जनक इन आंदोलनों की आड़ में एक ऐसी सामूहिक चेतना जगाने के प्रयास में हैं जहाँ फेसबुक, ट्विटर ही नहीं आसपास भी लोग यही डिमांड करते नज़र आएं कि या तो सबको आरक्षण दो या इसे ख़त्म करोबस यही तो लक्ष्य की पूर्ती होगी ... दूसरे शब्दों में कहा जाये तो इन आंदोलनों का मूल उद्देश्य आरक्षण लेना नहीं बल्कि प्रकारांतर से आरक्षण की व्यवस्था को ख़त्म कराना है।
सबको आरक्षण देना या इसे ख़त्म करना, दोनों ही स्थितियां सामान्य वर्ग के लिए फायदे का सौदा हैं जबकि OBC, SC, ST के लिए लगभग दोनों ही नुकसानदेहजहाँ से चले थे वही लौट आने जैसा, इसलिए भले ये दोनों मांगें दिखने में अलग लगें मगर हैं एकतरफा।
एक लेखक होने के नाते मैं ये तय नहीं कर पा रहा हूँ कि इस स्थिति में मैं आरक्षण का समर्थन करूँ या  विरोधसमर्थन करता हूँ तो सामान्य श्रेणी के उन लाखों नौजवानों की निराशा दिखती है जो सक्षम और योग्य होते हुए भी अपने मौके खो देते हैं और विरोध करूँ तो पिछड़े, दलित, वंचित नज़र आते हैं  जिनके हित में ये व्यवस्था कारगर सिद्ध हुई हैमूलतः मैं आरक्षण विरोधी हूँ लेकिन इस सच से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इसके सिवा और कोई कारगर पद्धति नज़र नहीं आती जो समाज की अंतिम पंक्ति में बैठे लोगों को आगे आने के मौके दे सके। बहरहाल, अगर ये लड़ाई और व्यापक हुई तो समाज का दो भागों में बट जाना स्वाभाविक है, ये आपको तय करना है के आप आरक्षण के समर्थन में हैं या विरोध में।

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