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ग्रहों का खेल

ग्रहों का खेल 


हाल ही में सावधान इंडिया का एक एपिसोड देखा, जिसे देख के यह विश्वास दृढ हुआ कि ज्योतिष अन्धविश्वास का मूल कारक है . नायक को पंडित जी सुझाते हैं कि उसकी कुंडली में पहली पत्नी की एक माह में मृत्यु लिखी है-- जिससे डर के वह पढ़ा लिखा युवक अपनी प्रेमिका से ब्याह न करके,बलि का बकरा बनाने के लिए एक मोटी भद्दी लड़की से शादी कर लेता है--लेकिन पत्नी नहीं मरती और हालात ऐसे बन जाते हैं कि प्रेमिका जल कर मौत की दहलीज तक पहुँच जाती है, खुद पत्नी की हत्या की कोशिश में जेल पहुँच जाता है और पत्नी सही सलामत रहती है-- जिसकी पंडित जी के अनुसार मृत्यु निश्चित थी... कुछ वक़्त पहले ऐसे ही एक दोषपूर्ण कुंडली वाली कन्या का विवाह एक कुत्ते से करा दिया गया था-- बाद में जिससे छुटकारा पाने के लिए उसे मारने की कोशिश तक की गयी थी। 
अभी दो हफ्ते पहले मेरे शहर सीतापुर में शादी करने जा रहे दूल्हे की बरातियों की हर्ष फायरिंग में गोली लगने से मौत हो गयी, अगर उसे यहाँ मरना था तो सबकुछ भाग्य में पहले से लिखा है का दावा करने वाले पंडित ज्योतिष उसकी कुंडली बांचते वक़्त क्यों नहीं जान पाये और जानते  थे तो उसकी शादी के लिए ये कैसा शुभ मुहूर्त निकाला था की उसकी जान ही चली गयी और लड़की के लिए भी ये कैसा कुंडली का मिलान था और कैसा शुभ मुहूर्त था की सुहागन बनने से पहले ही दूल्हा मर गया.. सारी ख़ुशी को मातम में बदलने वाले मौके को शुभ कैसे मान लिया गया????
है न काफी अजीब... जो समझने लायक बात है वो ये कि दुनिया में हर सेकेण्ड एक साथ, एक ही ग्रहदशा में कई बच्चे जन्म लेते हैं, लेकिन हिन्दू धर्म में जन्म लेने की वजह से कुंडली, मंगली, शुभ-अशुभ की जो अदृश्य आचार संहिता आप पर लागू हो जाती है, वह बाकी दुनिया पर लागू नहीं होती।  ज्यादा दूर मत जाइए... हम मुस्लिम्स पर ही नहीं लागू होती। हम आप एक ही समय, एक ही ग्रहदशा में पैदा होते हैं और आप मांगलिक हो जाते हैं, दोषपूर्ण कुंडली वाले हो जाते हैं, हमे पता भी नहीं चल पाता कि ये कमबख्त कुंडली क्या चीज़ है और हम एक सामान्य जीवन जीते हैं जबकि आप पैदा होने से लेकर बूढा होकर मरने तक शुभ-अशुभ मंगल-अमंगल के फेर में पड़े डर डर कर जीवन गुज़ारते हैं... 
सोचिये आप अपने जीवन का हर मुख्य, महत्वपूर्ण कार्य शुभ मुहूर्त तय करके करते हैं, हम बिना कुछ तय किये और वही सुख दुःख, विपदा, विपत्ति, अनिष्ट, ख़ुशी से सराबोर आपका जीवन भी गुज़रता है और हमारा भी--कहीं कोई अंतर नहीं... पर आपके जीन्स में समाया, ब्राह्मणों का पैदा किया डर, आप पर इस कदर हावी है कि आप खुल कर जी भी नहीं सकते, ये शुभ अशुभ, मंगल-अमंगल आपकी पैदाइश, शादी, व्यापर और लगभग हर मुख्य गतविधि में आपके हमकदम है। 
आप बाकायदा कुंडलियों के गुण मिला कर, शुभ मुहूर्त देख कर शादी करते हैं और हम बिना इस तमाशे के... फिर भी तलाक से लेकर, छुटकारे के लिए क़त्ल तक... सब हो जाता है तो फिर कुंडली मिलान और शुभ मुहरत का मतलब क्या हुआ... क्यों नहीं ये कर्मकांड किसी शादी को टूटने से बचा पाते हैं? हमारे यहाँ तो पंडित लोग बाकायदा सूप डुबा देते हैं कि जब तक सूप डूबा है शादी नहीं हो सकती, यानि अशुभ है... और उसी वक़्त में मुसलमानों के यहाँ धूमधाम से  शादियां होती रहती हैं और उनके भी सेम हश्र होते हैं, ज्यादातर चलती रहती हैं, कुछ टूटती हैं तो कहीं छुटकारे के लिए क़त्ल तक  हो जाते हैं, ऐन वही सब जो आपके शुभ मुहूर्त में होने वाले लगनों के बाद होता है, फिर इससे क्या साबित हुआ?? होना वही है जो आपकी नियति है और नियति आपके कर्म से निर्धारित होगी न कि ग्रहदशा से। .
शुभ मुहूर्त और पूजापाठ के साथ शुरू होने वाली किंगफिशर एयरलाइन हज़ारों करोड़ का झटका खा कर नहीं बच पाती... आंध्रा की राजधानी के लिए होने वाले यज्ञ हवन के भव्य पंडाल आग में जल कर खाक हो जाते हैं तो इनके मुहूर्त शुभ कैसे... कौन गलत था, मुहूर्त या उन्हें निकालने वाले पंडित?? सूर्यग्रहण पड़ गया, चन्द्र ग्रहण पड़ गया तो दुनिया भर के शुभ अशुभ शुरू हो जायेंगे... भले बाकी दुनिया इसे एक साधारण खगोलीय घटना के रूप में ले रही है--किसी को कुछ भी करने न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता पर आपके लिए ढेर सारे 'डू' और 'डोंट' के दिशा निर्देश पंडितों की तरफ से जारी हो जाते हैं... अरे हम एक ही प्लॅनेट पर रह रहे हैं भाई, जो दूसरों के साथ नहीं होगा वो आपके साथ क्यों होगा???
बॉलीवुड में बनने वाली हर अच्छी फिल्म कमाई कर जाती है और बुरी फिल्म निर्माताओं का पैसा  डुबा देती है जबकि लगभग हर फिल्म शुभ मुहूर्त में, नारियल फोड़ कर, पूजा पाठ के साथ शुरू की जाती है लेकिन हर फिल्म कामयाब नहीं होती फिर इन सब कर्मकांड की ज़रुरत क्यों है?? वहीँ दुसरे मुस्लिम, ईसाई या हॉलीवुड के ईसाई फिल्मकार हैं जिनकी फिल्मे बिना इन कर्मकांड के शुरू होती हैं और उनका भी सेम हश्र होता है.. अच्छी होती हैं तो चलती हैं, नहीं अच्छी होती तो नहीं चलती, फिर मुहूर्त शुभ अशुभ कैसे हो जाता है??
हो सकता है कि मेरी आलोचना आपको इसलिए बुरी लगे कि मैं मुस्लिम हूँ और आप सवाल करें कि क्या इस्लाम में बुराई नहीं तो मैं कहूँगा क्यों नहीं-- बुराई या कमी कहाँ नहीं... मुसलमानो की सबसे बड़ी कमी यही है कि वे आज तक खुद को चौदह सौ साल पहले की मानसिकता से निकालने में दिक्कत महसूस कर रहे हैं, जिसके लाखों उदाहरण आपको इन सोशल साइट्स पर मिल जायेंगे लेकिन यहाँ चर्चा अंधविश्वासों और पाखंड भरे कर्मकांडो से जीवन पर पड़ने वाले असर की है जहाँ आपके यह दाग बहुत गहरे हैं। 
बुरा मत मानिए--धार्मिक होने और अंधविश्वासी होने में बड़ा अंतर है, इस फर्क को पहचानिये-- यह  आलोचना नहीं एक सीख है जिसे ग्रहण कर लेंगे तो पैदा होने से लेकर मरने तक हर कदम पर आप जिस अनदेखे डर का सामना करते हैं, उससे मुक्ति पा जाएंगे... सुख दुःख,विपत्ति,आपदा, मृत्यु तो सभी को आने हैं --आपको भी हमे भी... बिना इस शुभ अशुभ के फेर में पड़े उनका सामना कीजिये--यही बहुत है। 

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