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मुसलमान से हिंदुस्तान तक

मुसलमान से हिंदुस्तान तक


इधर दो खबरों से और मन व्यथित हुआ कि यह कट्टरता हमे कहां ले जा रही है... 'उनको' कोसते कोसते ज़रा 'अपने' गिरेबान में भी तो झांक कर देखें कि आप क्या कर रहे हैं...
पहली खबर परसों थी कि मध्यप्रदेश में कई मदरसे किसी हिन्दू NGO के बनाये मिड-डे मील को सिर्फ इसलिये लेने से इंकार कर रहे हैं कि वे पूजापाठ करके खाना बनाते हैं या वितरण करते हैं। अच्छा आप भी सच्चे मुसलमान हैं तो होटलों पे खाना बनाते समय बिस्मिल्लाह करते ही होंगे? अब आपके सभी गैर मुस्लिम ग्राहक यह कह कर आपके यहां खाने से इन्कार कर दें की आप अल्लाह के नाम के साथ शुरू करते हैं और ये हमारे बिलीफ के खिलाफ है तो हम आपके यहां खाना नहीं खाएंगे... फिर?
इस देश में ज्यादातर किसान हिन्दू ही हैं और वे पूजापाठ करके ही फसलों की बुआई-कटाई वगैरा करते हैं, तो आपको इस देश में खाना खाने से भी इनकार कर देना चाहिये। हम जिस देश में रहते हैं वह एक बहुधर्मी देश है जहां एक साझा विरासत है, साझा संस्कृति है और ये हिन्दू मुस्लिम करके चलेंगे तो सब्ज़ियों-दालों से पूछिये, की उन्हें किसी मुस्लिम ने उगाया है, तभी इस्तेमाल कीजिये... बसों, ट्रेनों, या जिन गाड़ियों पर बैठे दौड़े-दौड़े फिरते हैं, उन सब से पूछिये कि किसी मुस्लिम की फैक्ट्री में बनी हैं तभी इस्तेमाल कीजिये... जो दूकान-धंधे खोल के बैठे हैं वहां ग्राहक से पूछ के उसे सामान बेचिये, सेवा दीजिये की वह मुस्लिम ही हो और तब शान दिखाइये। .
बोलिये कर पाएंगे ऐसा?
एक और खबर इलाहबाद के एक स्कूल से है जहां दस साल से राष्ट्रगान पर पाबन्दी है क्योंकि उसके सर्वेसर्वा श्री जियाउल हक़ को इसकी एक लाइन 'भारत भाग्य विधाता' का अर्थ यह समझ में आता है कि ये भारत को सबके भाग्य का विधाता बताया गया है जो इस्लामिक कांसेप्ट के विपरीत है। जनाब का स्कूल बंद कर दिया गया है और इन पर देशद्रोह का केस दर्ज हो गया है। अच्छा हुआ है और ऐसे मूर्खों के साथ ऐसा ही होना भी चाहिए।
जहां तक राष्ट्रगान का सवाल है यह ठीक है कि इसके साथ विवाद जुड़ा है, इसे टैगोर बाबू ने जार्ज पंचम के स्वागत सम्मान पर उसकी तारीफ में लिखा था लेकिन बाद में इसे राष्ट्रगान के रूप में अपना लिया गया और 27 दिसंबर 1911 में कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार गया गया था। इसकी एक लाइन "जन गण मन अधिनायक" (जो की सीधे-सीधे किसी इंसान की तारीफ साबित होती है) को बदलने की काफी वक़्त से मांग भी हो रही है और इसी पर सुब्रामणियम स्वामी ने पिछले साल बड़ी आपत्ति भी दर्ज कराई थी और श्रीमान जियाउल हक़ को जिस लाइन पर आपत्ति थी वह भारत भाग्य विधाता दो बार प्रयोग होता है। पहली बार "जन गण मन अधिनायक जय हे" जिसका शुद्ध हिंदी मतलब है "जन गण के मनों के उस अधिनायक की जय हो, जो भारत के भाग्यविधाता हैं!" यह और बात है कि यह लाइन दासता की प्रतीक है लेकिन इसका मतलब वह नहीं होता जो जियाउल हक़ ने निकाला।
दूसरी लाइन है "जन गण मंगलदायक जय हे भारत भाग्य विधाता" जिसका शुद्ध हिंदी अर्थ होता है "जनगण के मंगल दायक की जय हो, हे भारत के भाग्यविधाता"
मूल गीत में हालांकि एक व्यक्ति विशेष को समर्पित करके यह पंक्तियाँ दोहराई गयी थीं लेकिन बाद में उस व्यक्ति की जगह ईश्वर को मान कर इसे इस रूप में स्वीकार कर लिया गया था कि हम भारत का भाग्य लिखने/बनाने वाले ईश्वर की वंदना कर रहे हैं। वह जिसे ईश्वर के रूप में परिभाषित करते हैं आप अल्लाह के रूप में कर लीजिये, हालांकि इस गान की एक पंक्ति 'जन गण मन अधिनायक' हर रूप में अप्रासंगिक ही रहेगी क्योंकि शब्द 'अधिनायक' किसी व्यक्ति विशेष की तरफ इशारा करता है न कि ईश्वर की तरफ और इसमें आज भी परिवर्तन की गुंजाईश है लेकिन यहां मूल मुद्दा कट्टरता है... और मेरे ख्याल से अब वक़्त आ गया है जब आपको अपनी कट्टरता की सीमायें तय कर लेनी चाहिये। मुसलमान कट्टर न हो ये हो नहीं सकता लेकिन इस कट्टरता की एक परिधि तो आपको खींचनी ही होगी, उस लकीर को आपको पहचानना ही होगा जिसके पार जाने पर आप एक सभ्य और बहुधर्मी समाज के लिए अक्षम्य और अस्वीकार्य हो जाते हैं।
राष्ट्रगान वस्तुतः मूल गान का सक्षिप्त रूप है... मूल गान में पांच पद हैं और हमने राष्ट्रगान के रूप में सिर्फ पहले पद को अपनाया है, अगर आप सभी पांचों पदों पर गौर करेंगे तो खुद ही समझ जाएंगे कि यह किसी व्यक्ति विशेष के लिए ही समर्पित है।
जनगणमन-अधिनायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंग
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छलजलधितरंग
तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशिष मागे,
गाहे तव जयगाथा।
जनगणमंगलदायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।
अहरह तव आह्वान प्रचारित, शुनि तव उदार बाणी
हिन्दु बौद्ध शिख जैन पारसिक मुसलमान खृष्टानी
पूरब पश्चिम आसे तव सिंहासन-पाशे
प्रेमहार हय गाँथा।
जनगण-ऐक्य-विधायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।
पतन-अभ्युदय-वन्धुर पन्था, युग युग धावित यात्री।
हे चिरसारथि, तव रथचक्रे मुखरित पथ दिनरात्रि।
दारुण विप्लव-माझे तव शंखध्वनि बाजे
संकटदुःखत्राता।
जनगणपथपरिचायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।
घोरतिमिरघन निविड़ निशीथे पीड़ित मूर्छित देशे
जाग्रत छिल तव अविचल मंगल नतनयने अनिमेषे।
दुःस्वप्ने आतंके रक्षा करिले अंके
स्नेहमयी तुमि माता।
जनगणदुःखत्रायक जय हे भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।
रात्रि प्रभातिल, उदिल रविच्छवि पूर्व-उदयगिरिभाले –
गाहे विहंगम, पुण्य समीरण नवजीवनरस ढाले।
तव करुणारुणरागे निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा।
जय जय जय हे जय राजेश्वर भारतभाग्यविधाता!
जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

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