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ब्रेन हैकिंग

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ब्रेन हैकिंग 

ब्रेन हैकिंग 


अब आप कहेंगे कि ब्रेन कैसे हैक होता है। चलिये इसे बड़ी बारीकी से समझाता हूँ। इंसान के दिमाग के मुख्य दो हिस्से होते हैं चेतन और अवचेतन.. अवचेतन यानि सब कांशस माइंड, जो आसपास दिखती चीजों को बड़ी खामोशी से स्टोर करता रहता है और आपको यह अहसास भी नहीं हो पाता कि कब आप उस सब कांशस माइंड के निर्देशानुसार वह सोचने लगे जो शायद आम कंडीशन में आपकी सहज बुद्धि कभी स्वीकार ही नहीं करती। तमाम तरह की आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक गुलामी इसी अवस्था का परिणाम होती है।

और यही ब्रेन हैकिंग है जहां कुछ सयाने चतुर खिलाड़ी आपके अवचेतन में अपनी बातें इस तरह से रोंप देते हैं कि आपको अहसास ही नहीं हो पाता कि कब आप एक मोहरे की तरह ठीक वैसा ही सोचने लगे जैसा सामने वाले चाहते थे। हाल फिलहाल पूंजीवाद और राजनीति इस गेम को बड़े शातिराना अंदाज में खेल रहे हैं। जहां प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ सोशल मीडिया इसके सशक्त माध्यम हैं।

फिलहाल चुनावी दौर में इसके राजनीतिक पहलू की चर्चा ही करते हैं जहां भाजपा इसकी सुपर स्टार खिलाड़ी है। यह छोटे पैमाने पर तो तब से है जब से विधिवत राजनीति है, लेकिन बड़े पैमाने पर इन माध्यमों (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, सोशल मीडिया) के सहारे 2012-13 से खेला गया, जहां पूंजीवाद की धुर पैरोकार भाजपा ने बड़े कार्पोरेट्स को अपनी तरफ मिला कर मीडिया के एक बड़े हिस्से को अपनी तरफ कर लिया और सोशल मीडिया पर भारत का पहला आईटी सेल स्थापित कर दिया गया जिससे उनका प्लान कामयाब हो सका।

फिर यूपीए की हर नाकामी पर जोर शोर से बहसें शुरू कराई गयीं.. तब के मुद्दे देखिये, गरीबी रेखा को निर्धारित करने वाला प्रति व्यक्ति 33 रुपये का आंकड़ा पूरे देश में ऐसे प्रचरित किया गया जैसे 33 रुपये से ज्यादा कमाने वाला गरीब नहीं और कांग्रेस गरीबों का मजाक उड़ा रही, जबकि यह सिर्फ बीपीएल और एपीएल की सीमा रेखा थी यानि 33 रुपये से नीचे कमाने वाला बीपीएल है और उससे ऊपर वाला एपीएल है, इसमें अमीरी या गरीब न होने जैसा कोई निर्धारण नहीं होता और प्रति व्यक्ति का आंकड़ा सिर्फ सांकेतिक होता है.. मूल आंकड़ा पांच व्यक्तियों के एक परिवार की आय होता है जो अगर पांच हजार है तो एक व्यक्ति की आय निकालने पर यह आंकड़ा आयेगा। अब आप गणित खुद बिठा लीजिये कि 2012 में पांच हजार तक कमा पाने वाला परिवार अगर गरीबी रेखा से नीचे माना जा रहा है तो क्या गलत था।

इसी तरह सीएजी ने टूजी स्पेक्ट्रम ऑडिट और कोल ब्लाॅक ऑडिट में यह दावा किया कि इनकी प्रापर तरीके से नीलामी की गयी होती तो सरकार को इतनी आय (अनुमानित) होती, जो नहीं हुई, यानि यूपीए ने अपनी गलत नीति से इतना नुकसान उठाया.. अब भाजपा ने पूरे देश में इसे लाखों करोड़ के घोटाले के रूप में प्रचारित किया, जबकि घोटाला तब होता है, जब सामने रकम हो। यहां रकम हवा में थी तो घोटाला कैसा.. यही वजह है कि कभी इनमें कुछ साबित ही नहीं हुआ। इसी तर्ज पर आदर्श सोसायटी वाले मामले को घोटाले के रूप में प्रचारित किया गया जबकि वह सत्ता की बेशर्म बंदरबांट थी, जो कि सभी पार्टियाँ करती हैं लेकिन तब इसे भी घोटाले के रूप में हाईलाईट किया गया।
सी डब्लू जी के रूप में इसी तरह एक और घोटाला यूपीए के माथे जड़ा गया जो कि वाकई में सरकारी पैसे की लूट थी लेकिन मजे की बात यह कि इस लूट में कांग्रेस के सुरेश कलमाड़ी और भाजपा शासित एमसीडी की बराबर की भूमिका थी लेकिन एमसीडी को फ्रेम से गायब कर दिया गया और पूरे स्कैम का अकेला बिल कलमाड़ी के सर फट गया।

इसी के साथ लोकपाल के मुद्दे पर संघ प्रायोजित अन्ना आंदोलन खड़ा किया गया जिसके पीछे पूरे देश में 'मैं भी अन्ना' की गूंज हो गयी और पूरी भाजपा संघ चोला बदल कर अन्ना आंदोलन के साथ ऐसे खड़ी हो गयी जैसे वह आम जनता हो। इस बड़े जनसैलाब को देख आम आदमी भी प्रभावित हुए बगैर न रह सका। खुद मैं भी इस संक्रमण का शिकार हुआ था तब। तब ऐसा लगता था कि बिना लोकपाल लागू किये भारत की तस्वीर बदल ही नहीं सकती.. जबकि पिछले पांच साल में इस मुद्दे पर हल्की फुल्की चर्चा तक न हुई और इस आंदोलन से निकले सारे नेताओं का प्लेसमेंट बढ़िया ढंग से हो गया।

इसके साथ ही रामदेव को आगे करके काले धन का मुद्दा खड़ा किया गया और लोगों में ऐसी उम्मीद जगाई गयी कि देश के बाहर लोगों का इतना काला धन है कि अगर वापस आ जाये तो सबके खाते में पंद्रह-पंद्रह लाख आ जायेंगे। तब किसी संक्रमित व्यक्ति ने यह दिमाग न लगाया कि वह पैसा लोगों का है और कहीं पड़ा नहीं हुआ कि यह सरकार में आते ही उठा लायेंगे। बल्कि ऐसी कोशिश भी करते दिखेंगे तो लोग अपना पैसा विदड्रा करके टैक्स हैवेन देशों में इनवेस्ट करना शुरू कर देंगे.. फिर काहे का पंद्रह लाख।
बहरहाल इस तरह पूरी फील्डिंग सेट हो गयी और जनता के अवचेतन में पक्के तौर पर यह स्थापित कर दिया गया कि वर्तमान में हर तरफ समस्या ही समस्या है और उसकी जिम्मेदार कांग्रेस है जो बुरी तरह लूट खसोट मचाये है। कांग्रेस न इस रणनीति को समझ पाई और न कोई कारगर तरीका अपना पाई इससे निपटने का.. फिर जब पूरे देश में यह नैरेटिव बन गया कि इस सरकार को उखाड़ फेंकना है तब एक चमत्कारी विकल्प के रूप में मोदी की ब्रांडिंग की गयी और लोगों के दिमागों में यह बिठाया गया कि यह वह शख्स है जिसने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में गुजरात को अमेरिका योरप बना दिया है, यह वह व्यक्ति है जो सख्त प्रशासक है और भ्रष्टाचार से बखूबी निपट सकता है।

प्रधानमंत्री पद के लिये मोदी की उम्मीदवारी स्थापित करने के लिये आडवाणी राजनाथ आदि को मोहरा बना कर ड्रामा खेला गया। नकली लालकिले बना कर प्रधानमंत्री की तरह भाषण दिलवाये गये। टीवी ने साल भर पहले से 'ओपीनियन पोल' खेलना शुरू कर दिया जो कभी लोगों का ओपीनियन बताने के लिये नहीं होते, बल्कि एक तरह से लोगों का ओपीनियन बनाने के लिये होते हैं कि देखो.. फलां पार्टी जीत रही है और नार्थ साउथ ईस्ट वेस्ट हर तरफ इस नेता की लहर है.. यह चीज न सिर्फ उन्हें टार्गेट करती है जो वर्तमान सरकार के विरोध में हों, बल्कि खास तौर से उन्हें टार्गेट करती है जो स्विंगिंग वोटर्स होते हैं और ज्यादातर चुनाव क्षेत्रों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

रणनीति पूरी तरह सफल रही और कांग्रेस विरोध में खड़ी हुई भीड़ को नरेन्द्र मोदी के रूप में एक विकल्प मिल गया और नतीजा सामने था। यह बड़े पैमाने पर की गयी ब्रेन हैकिंग का पहला उदाहरण था।

किसी भी चुनाव में पार्टिसिपेट करने वाले मतदाता मुख्य रूप से पांच खांचों में बंटे होते हैं.. एक वे जो किसी पार्टी/नेता के धुर समर्थक होते हैं, दूसरे वे जो किसी पार्टी/नेता के थुर विरोधी होते हैं, तीसरे वे जो मतदान जैसे किसी अधिकार को खातिर में नहीं लाते, बल्कि किसी तरह के लालच, पैसे या शराब के एवज में वोट दे आते हैं, चौथे वे जो न इधर होते न उधर बल्कि आखिरी वक्त में अपना मूड बनाते हैं और स्विंगिंग वोटर्स के रूप में पहचाने जाते हैं और पांचवे वे जो वोट देते वक्त बस जाति और धर्म को ही सर्वोपरि रखते हैं।

सभी राजनीतिक पार्टियाँ खास दूसरे और चौथे वर्ग को ले कर अपनी रणनीति बनाते हैं और यही मेन टार्गेटेड वोटर्स होते हैं.. जैसे 2014 के चुनाव में भाजपा ने बड़ी सफाई से कांग्रेस के विरोध में खड़े हुए वोटर्स और स्विंगिंग वोटर्स को टार्गेट करके अपने पाले में किया और इस बार चूँकि वह खुद सत्ता में है तो यही खेल अब उसके लिये भारी भी पड़ रहा है और मजबूरी में उन्हें राष्ट्रवाद और हिंदू मुस्लिम के मुद्दे पर उतरना पड़ रहा है, जो उनकी यूएसपी है। बाकी विकास और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे उनकी तरफ से फ्रेम से बाहर हैं और प्रधानमंत्री के लेवल से भी बस उसी कांग्रेस को कोसा जा रहा है जो पांच साल से सत्ता से बाहर है।

बहरहाल ब्रेन हैकिंग के पिछले फार्मूले अभी भी लागू हैं और अब चूँकि मीडिया का बड़ा हिस्सा उनके अंडर में आ गया है तो उनके सहारे बड़ी सफाई से यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि पूरे टर्म में पर्यटन मंत्री और अंबानी अडानी के एजेंट बने रहे मोदी बड़ी साफ और ईमानदार छवि के हैं। उन्होंने बहुत विकास (जो कहीं दिखता नहीं) किया है। पाकिस्तान की दो तीन बार यात्रा, शाल आम वगैरह के लेनदेन, पठानकोट मामले में आईएसआई को ही बुला कर जांच करवाने के बावजूद पाकिस्तान को बेहतर जवाब दे रहे हैं। पूरे टर्म में पांच सौ बार सीजफायर वायलेशन के बावजूद पाकिस्तानी सेना को डरा कर रखने में कामयाब रहे हैं। राफेल डील में अनिल अंबानी के पक्ष में नियम कायदे ताक पर रखने के बावजूद भ्रष्टाचार से लड़ रहे हैं।

ओपीनियन पोल वाला खेल विभिन्न मंचों से रूप बदल बदल कर लगातार जारी है और देश के वैज्ञानिकों की उपलब्धियों को भी ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे अब से पहले 'डीआरडीओ' और 'इसरो' मुर्दा पड़े थे और जो भी उनकी उपलब्धियां हैं वे बस उन्होंने इन्हीं पांच साल में हासिल की हैं और उन उपलब्धियों का क्रेडिट भी उन वैज्ञानिकों को नहीं बल्कि खुद मोदी को है।

आप टीवी पर दिखाई जा रही न्यूज और भाजपाई विज्ञापनों से पटे अखबारों के अंदर खबरें ढूंढिये। दोनों जगह न्यूज विद व्यूज के दर्शन होंगे जो आपके अवचेतन में बड़ी खामोशी से भाजपा को स्थापित कर रहे होंगे। आप टीवी पर रोज शाम से रात तक होने वाली बहसें सुनिये.. वहां जमीन से जुड़े आम आदमी के मुद्दों पर बात नहीं होती बल्कि डेलीब्रेटली एक पैटर्न के तहत सिर्फ उन मुद्दों पर बात होती है जो भाजपा लोगों के सामने रखना चाहती है, जिनसे उन्हें फायदा हो सके। कई प्रोग्राम ऐसे होते हैं जहां दर्शक पार्टिसिपेट करते हैं और आपको लग सकता है कि 'यह जनता है' और रिपोर्टर रैंडमली सवाल ले रहा है लेकिन वह दर्शक असल में भाजपा के लोग (स्टूडियो वाले.. सड़क की भीड़ वाले नहीं) होते हैं और सवाल जवाब स्क्रिप्टेड होते हैं।

मोदी शाह समेत भाजपा के सभी बड़े नेताओं के इंटरव्यू स्क्रिप्टेड होते हैं जहां काउंटर क्वेश्चन की इजाजत नहीं होती। देखने वाले बुरी तरह भ्रमित हो सकते हैं इसलिये रवीश और अभिसार को अपील करनी पड़ रही है कि इस ब्रेन हैकिंग से बचना है कि टीवी से ही दूर रहिये।

इस पूरे फ्रेम से इतर आरएसएस के तत्वावधान में जारी एक फुल टाईम स्ट्रेटेजी है जो जमीन पर सतत चलती रही है और आज अपने चरम पर है.. लोगों को 'हिंदू' बनाने की कोशिश.. और इसमें अपने टाईम से कांग्रेस, सपा, टीएमसी और कुछ हद तक राजद ने भी अच्छा खासा योगदान दिया है मुस्लिम तुष्टीकरण वाली नीतियों से, जो अमली तौर पर कामयाब हो कर मुसलमानों का कुछ भला तो कभी कर नहीं पाईं लेकिन सामने खड़े गैर मुस्लिम को 'हिंदू' बनाने में जरूर कामयाब रहीं.. लेकिन बहरहाल यह कोई चुनावी रणनीति नहीं बल्कि एक मनमाफिक हिंदू राष्ट्र की स्थापना के नाम पर सतत चलने वाली प्रक्रिया है, जिसे सिर्फ चुनावों से जोड़ कर देखना ठीक नहीं और यह 'हिंदू' हुआ वर्ग पहली समर्थकों वाली श्रेणी में आता है न कि टार्गेटेड वोटर्स में।

बहरहाल ब्रेन हैकिंग के लिये एलिजिबल वोटर्स सभी पार्टियों के निशाने पर रहते हैं लेकिन बाकियों की दिक्कत यही है कि भाजपा और बचा खुचा कांग्रेस के ले जाने के बाद मीडिया में छोटी पार्टियों के लिये कोई स्पेस ही नहीं बचा जहां वे अपनी प्लानिंग को अप्लाई कर सकें, इस वजह से उन्हें भाजपा कांग्रेस के मुकाबले जमीन पर ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है। हां सोशल मीडिया जरूर बाकियों की तरह उन्हें भी उपलब्ध है लेकिन यहां 'आप' को छोड़ कर सभी फिसड्डी हैं और कोई अहम प्रभाव नहीं पैदा कर पा रहे।

राहुल की मिनिमम इनकम गारंटी स्कीम, तीन साल बिना पर्मीशन/टैक्स स्टार्टअप, मार्च-20 तक बीस लाख केन्द्रीय पदों की भर्तियों की पेशकश इन्हीं दो वर्गों को टार्गेट करने के लिये हैं.. अब वे सीमित मीडिया संसाधनों के बावजूद किस हद तक इन्हें लोगों के दिमागों में रोप पाते हैं.. उनकी कामयाबी इसी पर डिपेंड है।

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