यह एक नॉन-फिक्शन है जो निजी जिंदगी के अनुभवों पर आधारित है।

बचपन में मैं एक आम टिपिकल मुसलमान हुआ करता था जो नमाज पढ़ता था, रोजे रखता और जिसे आखिरत पर पूरा यकीन था... बाकी मुसलमानों की तरह ही इस बात पर मेरा अंधा यकीन था कि यह पूरी दुनिया (यह प्लेनेट, प्लेनेटरी सिस्टम, यूनिवर्स) खुदा ने बनाई है और इस दुनिया में आदम और हव्वा के रूप में दो इंसानों से जीवन की शुरुआत कराई है। अलग-अलग वक्त में ढेरों पैगम्बर भेजे, जिन्होंने जीवन जीने के सही तरीके, जीवन का उद्देश्य और उस सर्व शक्तिमान ईश्वर की इबादत करने के तरीके... वगैरह के ईश्वरीय संदेश अपने-अपने समाज तक पहुंचाये हैं।

हम मरेंगे तो कर्मों के हिसाब से हमें कब्र में भी सजा या इनाम मिलेगा और जब अंत में कयामत के रूप में यह पूरा सिस्टम नष्ट होगा तो वापस इस दुनिया में जितने इंसान पैदा हुए रहे होंगे सभी जिंदों मुर्दों को उठा कर उनका हिसाब किताब होगा और फिर उन्हें दोजख के अजाब या जन्नत के इनामों से नवाजा जायेगा... जहां हमें हमेशा हमेश की जिंदगी गुजारनी है जो कभी खत्म न होगी।

इस कांसेप्ट में छोटी-छोटी सैकड़ों ऐसी बातें शामिल हैं जिन पर सिर्फ एक ही सूरत में यकीन किया जा सकता है कि आप इस तरफ दिमाग न लगायें। दिमाग लगायेंगे तो उलझनें पैदा होंगी, सवाल पैदा होंगे और उन उलझनों और सवालों से जूझने की कोशिश करेंगे तो सारा तिलस्म भरभरा कर ढह जायेगा। लगभग सभी धार्मिक कांसेप्ट्स का यही हाल है। यह पहले कदम से ही एक तार्किक बुद्धि को चैलेंज करना शुरू कर देते हैं और आपको मजबूरन तर्क और आस्था में से एक का चुनाव करना पड़ता है।

दुनिया की ज्यादातर आबादी आस्था के आगे घुटने टेक देती है, क्योंकि उसका दबाव पैदा होते ही पड़ना शुरू हो जाता है... घर के सदस्यों से, स्कूल के सहपाठियों और टीचर्स से, मुहल्ले के दोस्तों और रिश्तेदारों से और वर्क प्लेस पर कलीग्स से... जब हर तरफ लोग उन्हीं इल्लॉजिकल आस्थाओं का गुणगान कर रहे हों तो खुद को उनसे बचाना नामुमकिन की हद तक मुश्किल होता है।

लेकिन मुझमें लेखन की विधा बचपन से ही विकसित होनी शुरू हो गयी थी और लेखक के लिये सबसे जरूरी चीज है कि वह सबकुछ जाने... जितना हो सके उतना जाने। तब तक मजहब के विषय में जितना भी जाना था वह बस अपने फिरके से सम्बंधित लिटरेचर से ही जाना था... लेकिन फिर जब 'मानने' की दुनिया से निकल कर 'जानने' के पथ पर चला तो पता चला कि हमारे ही धर्म के ही शिया पंथ ने जो लिटरेचर लिख रखा था वह पैगम्बर और चौथे खलीफा हजरत अली से सम्बंधित हिस्से को छोड़ कर बाकी लगभग सब एकदम उलट था।

कैसे अंदाजा लगाया जाये कि किसने ज्यादा सही लिखा है? तब यह चीज समझ में आई कि इतिहास में सबकुछ न सिर्फ अच्छा हो सकता है न सबकुछ बुरा और मजहबी लेखक, चाहे वे जिस पंथ के हों कभी उस इतिहास के साथ न्याय नहीं कर सकते, क्योंकि वे सिर्फ वही लिखेंगे जो महिमामंडन करने वाला हो, वे उन गुजर चुके महिपुरुषों की कमियों, नाकामियों और बुराइयों को भी कुटिलतापूर्वक जस्टिफाई ही करेंगे।

ऐसे में बेहतर है कि उन न्यूट्रल लोगों को पढ़ा जाये जिन्होंने उस इतिहास को बिना किसी पूर्वाग्रह के सबके लिखे को पढ़ कर और तमाम दूसरे साक्ष्यों को आधार बना कर शोध किया हो और तब लिखा हो कि सच होने की सबसे नजदीकी संभावना क्या हो सकती है... और वह सब पढ़ते ही सारा तिलस्म टूट गया, सारे ही धर्म रेत के महल की तरह भरभरा कर ढह गये और सारी हकीकत सामने आ गयी। मुझे थोड़ा सदमा लगा, थोड़ा अफसोस हुआ कि जैसे मेरा कुछ छीन लिया गया हो लेकिन धीरे-धीरे पढ़ते समझते अंदाजा तो पहले ही हो चुका था।

फिर जब वह सारी बातें खारिज हो गयीं जो इस दुनिया के धार्मिकों ने गढ़ रखी हैं तब नये सवालों ने घेर लिया कि फिर यह सब कैसे है... क्यों है? तो इस विषय में जो भी वैज्ञानिक चिंतन, शोध या संभावनायें थीं, उन पर नजर डाली और कई तरह की नयी संभावनायें समझ में आईं जिनमें इस प्लेनेट को, इस प्लेनेटरी सिस्टम को और यूनिवर्स को बांधा जा सकता था... अब जब यह संभावनायें समझ में आईं तो यह सवाल वापस सामने आ खड़ा हुआ कि यह सबकुछ सेल्फमेड है या किसी ने गढ़ा है? अगर किसी ने वाकई इसे गढ़ा है तो वैज्ञानिक नजरिये से उसकी किस-किस तरह की संभावनायें हो सकती हैं।

अगर आप आइन्स्टीन की पीढ़ी के साथ खड़े हो कर सोचते हैं तो इस पूरे सिस्टम में, जिसे सृष्टि कह सकते हैंहर चीज़ फिक्स है, यानी हर चीज़ का एक फार्मूला तय है कि ऐसा है तो वैसा होगा और  वैसा है तो ऐसा होगा... यानी सम्भावना याहो सकता हैके लिये कोई जगह नहीं, लेकिन इस पीढ़ी की थ्योरी में कई अनसुलझे सवाल भी थे जिनके जवाब स्टिंग थ्योरी ने दिये, जो रिलेट करती है क्वांटम फिजिक्स से और क्वांटम फिजिक्स में संभावनाओं— या यूँ कहें किहो सकता हैके लिये पूरी गुंजाईश मौजूद है तो अब अगर इस एंगल को ध्यान में रखते हुए ही हम चिंतन मनन करें तो इस पूरे सिस्टम को लेकर कई तरह की संभावनायें बनती हैं, जिन पर वैज्ञानिक वर्ल्ड में चर्चा होती रहती है... और हम भी उन्हीं संभावनाओं पर नज़र डालेंगे

इन्हीं चिंतन मनन पर सोशल मीडिया पर कई लेख लिखे हैं और यह किताब उन्हीं लेखों का संग्रह है जो कई मोतियों को एक लड़ी में पिरो कर एक माला बनाने का प्रयास भर है... अब यह प्रयास कितना सफल रहा, यह निर्णय आप करेंगे।

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