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क्या होती है सरकार?

       क्या होती है सरकार?       


             कभी कभी मन में अजीब सी कल्पनाएँ उभरती हैं, सवाल उभरते हैं। ऐसे ही एक खाली वक़्त में मन में ये सवाल भी कौंधा कि क्या होती है सरकार और जवाब में कुछ कल्पनात्मक और साथ में रचनात्मक जवाब भी मन ने स्वयं ही सृजित कर दिए।

             किसी मौसम में ये कार जैसी होती है जिसे दौड़ाया तो कार की गति से जा सकता है लेकिन अक्सर लोग इसमें मनमौजी समर्थक नाम के पहिये लगा लेते हैं -- गढ़बंधन धर्म के नाम कि मजबूरी के लोगो के साथ।  ये पहिये अक्सर इन्हें  मनमौजी होते हैं कि प्रधानमंत्री नाम का ड्रायवर अगर इसे उत्तर कि दिशा में ले जाना चाहता है तो ये पहिये अलग अलग दक्षिण के साथ पूर्व और पश्चिम में दौड़ने कि जुगत में लग जाते हैं और बेचारी सर'कार' कार जैसे गति की क्षमता रखते हुए भी टांग बंधे खच्चर कि तरह रंक्ति लड़खड़ाती आगे सरकती है।  ऊपर से विपक्ष नामी दर्शक कई पिलपिले मीडियाकर्मियों के साथ इस लंगड़ाती लड़खड़ाती सर'कार' को घेरे नटखट बच्चे की तरह इसके साथ खिलवाड़ करते इसकी खाट खड़ी करने में कोई  कोर  कसर नहीं उठा रखते। 
             किसी मौसम में ये सुन्दर सुघड़ कन्या जैसी हो जाती है , कुछ लोगों कि -- जो बाकायदा सत्तापक्ष नाम की बिरादरी बनाने में कामयाब हो जाते हैं, ये बाकायदा प्रेमिका बन जाती है और वह मजनू और फरहाद जैसे बुढ़वकों को पछाड़ कर अपनी प्रेमिका से ऐसा प्रेम करते हैं कि प्रेम भी कही इंसानी  अस्तित्व में आ पाता तो शर्मा कर यमलोक कूच कर जाता। यह अपनी प्रेमिका कि शान में कसीदे  पढ़ने  का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते।  लोगों को अपनी प्रेमिका में पृथ्वी का एक मून दिखायी देता है इन्हें तो अपनी प्रेमिका में शनि के नौ मून दिखायी देते हैं।

             इनके साथ ही एक प्रतिपक्ष नाम की बिरादरी भी वजूद में आती है , इन्हे ये सुन्दर सुघड़ कन्या फूटी आँख नहीं सुहाती।  नज़र का फेर है बंधु, वर्ना जो कन्या सत्तापक्षी को उर्वशी और मेनका से भी बढ़कर लगे है वही प्रतिपक्षी को हिडिम्बा और सूपर्णखा से भी ज्यादा बुरी दिखती है और भरे दरबार में, दुशाशन के अवतार में इसकी साड़ी उतारने में  ऐसा लगते हैं कि पांच साल  इसी तपस्या में गुज़ार देते हैं  कि कब सर'कार' कि साड़ी ख़त्म होगी। कई बार तो वो इसे उतार कर खुद पहनने में कामयाब हो जाते हैं लेकिन कई बार ये लोकतंत्र का मुआ लोक फिर से सर'कार' को वही साड़ी पहना देता है -- अगले पांच साल के लिए।

             वैसे ये आपके और हमारे तो हर मौसम में काम आती है। वो दिन हवा हुए जब हम हर खराब दश को बुरे भाग्य के माथे थोप देते थे। अब तो सरकार ने ये दायित्व अपने ऊपर ले लिया है। अब आपको कुत्ता भी काट ले तो आप पूरे अधिकार से सरकार पर दोषारोपण  कर सकते हैं , आखिर सरकार की ही ज़िम्मेदारी है वो कुत्तों कि फैमिली प्लानिंग करे -- कर रही होती तो कोई आवारा कुत्ता थोड़े न आपको काटता। अगर जनवरी में भी आपको सर्दी जुकाम हो जाए तो समझिये कि सारा कसूर सरकार का है।  क्यों नहीं वो ग्लोबल वार्मिंग पर ध्यान देती और इस बात को सुनिश्चित करती के सर्दियाँ मई जून में पड़नी चाहिए और गर्मियां दिसंबर जनवरी में।  अगर शादी के दिन ही आपकी होने वाली पत्नी अपने प्रेमी के साथ भाग जाए तो इसकी ज़िम्मेदारी भी सरकार के सर है , न वो मोबाइल इंटरनेट जैसे माध्यम बाज़ार में लाती न आपकी होने वाली को पींगे बढ़ाने कि ऐसी फैसिलिटी मिलती कि उस पर इशक का ऐसा भूत चढ़ता कि शादी वाले दिन ही मुई भागती , अरे एक दिन आगे एक दिन पीछे भी तो भाग सकती थी।

             इसके सिवा अगर आपकी चाय में शक्कर ज्यादा हो जाए , सब्ज़ी में नमक ही न हो , आपके बच्चे को पड़ोसी पीट जाए , मंदिर मस्जिद से आपकी चप्पलें चोरी हो जाएँ , आपकी फटी जेब से कुछ चिल्लर गिर जाए , कोई गाय आपके दरवाज़े पर शिट कर जाए , या आपके पसीने कि दुर्गन्ध से आपकी गर्लफ्रेंड भड़क जाए तो आप पूरे अधिकार के साथ सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा सकते हैं , इसका कोई सजता सा बढ़िया सा तर्क तो आप खुद ही ढूंढ सकते हैं -- इसका मुझे यकीन है।

           जय हो।

Ashfaq Ahmad

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