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फिल्म समीक्षा: मुक्काबाज़

 


कैसी है फिल्म मुक्काबाज़ 

मुक्काबाज़ : मेरी नज़र में
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हालाँकि काफ़ी देर हो चुकी है मगर फ़िल्म का रिव्यु लिखने से खुद को रोक नहीं पाया।
जिस तरह की फिल्मों के लिए अनुराग कश्यप जाने जाते हैं, ये उससे बिल्कुल अलग फ़िल्म है। इंटरवल आते-आते मुझे गूगल करना पड़ा कि क्या वाक़ई ये अनुराग कश्यप की ही फ़िल्म है!
मैं अनुराग कश्यप का डाई हार्ड फैन रहा हूँ। गैंग्स ऑफ वासेपुर का हिफ़्ज़ कर चुका हूँ और ब्लैक फ्राइडे, गुलाल, अगली, रमन राघव और 'नो स्मोकिंग' मेरी ऑल टाइम फेवरेट फिल्में रहीं हैं मगर इस फ़िल्म से मुझे निराशा ही हाथ लगी।
रवि किशन, विनीत कुमार सिंह और जिमी शेरगिल की एक्टिंग हर बार की तरह इस बार भी क़ाबिल-ए-तारीफ़ थी मगर फ़िल्म की बात की जाए तो ये फ़िल्म कम और बालाजी टेलीफिल्म्स का सीरियल ज़्यादा लगी मुझे। 40 मिनट में उबासी आने लगी। डेढ़ घंटे झेलने के बाद फ़िल्म छोड़कर चला आया।
और रही बात बॉक्सिंग की तो ये फ़िल्म मुझे हर लिहाज़ से बकवास लगी। बस एक ही चीज़ अच्छी थी कि स्पोर्ट्स फेडरेशन का हरामीपन दिखाने की अच्छी कोशिश की गयी। (मुआफ़ कीजिएगा मगर स्पोर्ट्स फेडरेशन में खेल के नाम पर जो कुछ होता है उन 'कुकृत्यों' के आगे 'हरामीपन' शब्द भी एक सम्मान की तरह लगेगा)
नोट : मैं खुद मार्शल आर्ट्स का नेशनल प्लेयर, नेशनल रेफ़री हूँ और 5 साल तक कोच भी रहा हूँ। कराटे और ताइक्वांडो के साथ-साथ मिक्स मार्शल आर्ट्स भी खेली है। मिक्स मार्शल आर्ट्स की नेशनल चैंपियनशिप में तीन साल के लगातार नेशनल चैंपियन को 30 सेकंड में नॉक आउट किया है तो मुझे खेल का ज्ञान देने की हिम्मत भी मत कीजिएगा।
बाकी जो हइए है, सो हइये है।

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