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ब्यूटी ऑफ़ इस्लाम

ब्यूटी ऑफ़ इस्लाम
ब्यूटी ऑफ़ इस्लाम 


ब्यूटी ऑफ़ इस्लाम 


आजकल आई. एस., अलकायदा, बोकोहरम, अल-शबाब, तहरीक-ए-तालिबान की वजह से मुसलमानों की आक्रामक और बर्बर छवि पूरी दुनिया में बन रही है लेकिन यह सच नहीं है, इस छवि को तोड़ने की जरूरत है... इस्लाम तो अपने सही मायनों में अमन और इंसाफ का मजहब है, उस सूफी परंपरा का वाहक है जिसने संसार को प्रेम और उदारता का संदेश दिया, जिसका जिक्र प्रधानमन्त्री अपने कई भाषणों में कर चुके हैं।इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि ज्ञान के आदान/प्रदान में इस्लाम ने दुनिया को सबसे अधिक जोड़ा है।

ज्ञान पर पश्चिम के वर्चस्व के कारण अंग्रेजी जैसे आज अंतर्राष्ट्रीय संपर्क की भाषा है, उसी तरह आठवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से ग्यारहवीं शताब्दी के अंत तक वैश्विक संपर्क की भाषा अरबी थी। अरबी प्रभुत्व के उस युग में मानो खलीफा से लेकर साधारण नागरिक तक सब विद्यार्थी हो गये थे। ज्ञान की जितनी प्यास नौवीं-दसवीं शताब्दी के अरब संसार में थी, वह उससे पहले कभी नहीं देखी गई थी।

उस बौद्धिक जागरण ने इस्लामी संसार में पुस्तकों की संस्कृति को जन्म दिया। सुदूर इलाकों से लोग असंख्य भारी भारी ग्रंथों को ऊंटों, खच्चरों और घोड़ों पर लाद कर लौटने लगे। नौवीं सदी का लेखक याकूबी लिखता है कि उसके समय में अकेले बगदाद शहर में सौ पुस्तक विक्रेता थे जो महज पुस्तकें नहीं बेचते थे, बल्कि ग्रंथों की नकल बनाते और सुलेखन कला के प्रशिक्षक केंद्र भी चलाते थे। मूल पांडुलिपियों की नकल बना कर उन्हें बेचने के काम में अनगिनत विद्यार्थी लगे थे।व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा पुस्तकों के संग्रह के आधार पर बनती थी।

बगदाद के एक हकीम को जब बुखारा के सुल्तान ने अपने यहां रहने के लिए आमंत्रित किया तो हकीम ने वह निमंत्रण केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि उसे अपनी किताबों को ढोने के लिए चार सौ ऊंटों की आवश्यकता थी। दसवीं शताब्दी में वजीर साहब-इब्न-उब्वाद के पास एक लाख से अधिक किताबें थीं। तब इतनी किताबें यूरोप के सभी पुस्तकालयों को मिला कर भी नहीं थीं।1064 ई0 में अकेले बगदाद में वैज्ञानिक ज्ञान के तीस बड़े शोध केंद्र थे। बगदाद के अलावा काहिरा, सिकंदरिया, यरूशलम, अलेप्पो, दमिश्क, मोसुल, तुस और निशपुर अरब संसार में विद्या के महत्वपूर्ण केंद्र थे।

जब यूरोप के दूसरे देश अंधकार में गुम थे तब स्पेन में अरबों की उपस्थिति के कारण ज्ञान की रोशनी प्रकाशित हो रही थी। अरबों के पास प्राचीन यूनानी दार्शनिकों और वैज्ञानिकों की रचनाएँ सुरक्षित थीं। उनके माध्यम से यूनानी ज्ञान ने यूरोप में प्रवेश किया। न केवल यूनानी बल्कि भारतीय और चीनी ज्ञान भी उनके माध्यम से यूरोप पहुंचा। अरबी से लैटिन में अनुवादित विज्ञान ग्रंथों ने यूरोप में वैज्ञानिक ज्ञान की नींव डाली तर्क और विवेक पर आधारित विज्ञान और दर्शन का अनमोल खजाना इसाई चर्चों के अंधविश्वास और पाखंड के कारण दबा पड़ा था।

अरब वैज्ञानिक जाबिर को आधुनिक रसायन विज्ञान का जनक माना जाता है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में अल-राजी की किताबें यूरोपीय विश्वविद्यालयों में आधार ज्ञान के रूप में कार्य करती रहीं।

अरबों का अरस्तू कहे जाने वाले इब्ने सिना ने दर्शन शास्त्र, नक्षत्र विज्ञान, रसायन शास्त्र, भुगोल, भूगर्भ शास्त्र, तर्क शास्त्र, गणित, भौतिक विज्ञान, मनोविज्ञान, काव्य, संगीत आदि विषयों पर 450 ग्रंथ लिखे। अलजेबरा शब्द अरबी का है। प्रायः सभी पूर्वी देशों में ज्योतिष का ज्ञान पंडितों पुरोहितों के हाथ में था। अरब लोगों ने उसे नक्षत्र विज्ञान के समीप लाकर विज्ञान के रूप में विकसित किया।सर्जरी को विज्ञान के रूप में विकसित करने का श्रेय कोरदोवा के अरबी चिकित्सक अल-जहरवी को जाता है। अबु बक्र ने अंतरिक्ष के नक्षत्र मंडल और उनकी गति के संबंध में जो विचार प्रस्तुत किये, उन्हीं की सहायता से बाद में ब्रूनो, गैलीलियो और कोपरनिकस अपने युग परिवर्तनकारी अनुसंधानों को विकसित कर सके।

भारत और यूरोप को जोड़ने वाला प्रमुख व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र बगदाद नगर था। जब तक वह शहर खलीफाओं के संरक्षण में रहा, भारत का ज्ञान इसके माध्यम से यूरोप पहुंचता रहा। खलीफा हारून रशीद के समय तो बगदाद का दरबार भारतीय विद्वानों की चहल पहल से भरा रहता था, जो वहां मुख्यतः वैद्य के पदों पर आसीन थे।

अरब विद्यार्थियों को अध्ययन के लिए भारत भेजा जाता था। खलीफा ने पंडितों की सहायता से संस्कृत के दर्शन, वैद्यक, ज्योतिष, नक्षत्र विज्ञान और गणित के ग्रंथों का अरबी में अनुवाद कराया। अरब संसार से होकर जब यह ज्ञान यूरोप पहुंचा तो वहां लैटिन में इसका अनुवाद किया गया। भारतीय विद्या और विद्वानों के प्रति इस्लामी संसार में बड़ा सम्मान था। बसरा के एक निवासी जाहिज ने लिखा है कि भारतीय ज्योतिष, गणित, चिकित्सा शास्त्र, दर्शन, साहित्य और नीति शास्त्र में दुनिया में सबसे आगे हैं। दुखद यह है कि पश्चिम एशिया में विकसित जिस इस्लामी संस्कृति ने यूरोप को सभ्य समाज बनाया, आज ठीक उसके विपरीत कट्टरपंथियों द्वारा इस्लाम के नाम पर उसी इलाके से एक गलत संदेश पूरी दुनिया को जा रहा है। आज जरूरत इसकी है कि सभी धर्म निरपेक्ष ताकतों द्वारा इस तरह की विचारधारा से जंग लड़ी जाये और इस्लाम की सही तस्वीर दुनिया के सामने रखी जाये।
With gratitude: Uday Prakash Aroda

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