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धर्म यात्रा 7

धर्म यात्रा 7

भ्रूण के विकास की थ्योरी

अच्छा अब आइये भ्रूण के विकास पे— मूर के मुताबिक किसी को यह जानकारी उस दौर में होना संभव नहीं था, लेकिन क्या वाकई मूर का ऐसा सोचना सही था— अब यहां पे खुद अपना दिमाग इस्तेमाल कीजिये और चलिये प्राचीन काल में। दो हजार से पांच हजार साल पहले।

  उस दौर में सभ्यतायें तीन फार्मेट में पनप रही थीं— एक वनों में रहने वाले आदिवासी, दूसरे गाँवों में रहने और कृषि और पशुपालन करने वाले और तीसरे नगरों में रहने वाले जो खाने पीने के सामान अतिरिक्त जीवन निर्वाह के लिये जरूरी वस्तुओं का क्रय विक्रय करते थे।

  इन नगरों में वेश्यावृत्ति मनोरंजन के लिये उपलब्ध एक स्वीकार्य और सम्मानित व्यवसाय हुआ करता था। बाइबिल में वेश्यावृत्ति का जिक्र है, महाभारत के अनुसार हस्तिनापुर में हजारों वेश्यायें थीं— ग्रीक सभ्यता में साइप्रस, सिसली, किंगडम ऑफ पोन्टस, कैपेडोसिआ वेश्यावृत्ति के मुख्य केन्द्र थे।
  भारत में इसके लिये बाकायदा नगरवधुयें तैयार की जाती थीं, नेपाल में देउकी रीति होती थी लड़कियों को वेश्या बनाने के लिये, जेरुसलम में कामुक गतिविधियों के लिये बाकायदा मंदिर हुआ करता था, यूनानी सभ्यता में इसे 'पवित्र काम' की संज्ञा दी जाती थी।
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Pompeii

  2000 साल पहले माउंट विसुवियस के विस्फोट में नष्ट हुए पोम्पेई को जब 1748 में खोदा गया तो शहर के साथ एक वेश्यालय भी मिला जिसमें दस कमरे और सहवास को दर्शाती पेंटिंग्स मौजूद थीं। कहते हैं इसकी शुरुआत सुमेरियाई सभ्यता में सुमेरिया के राजा और प्रेम की देवी इनान्ना के मिलन से हुई थी.. तब सेक्स किसी भी सभ्यता में वर्जित विषय नहीं था, जहां भारत में बाकायदा सेक्स की देवी रति थीं, वहीं ग्रीक सभ्यता में एफ्रोडियेट को यह सम्मान प्राप्त था।

  ज्यादातर बड़े नगर समुद्री किनारों पर आबाद थे, जहां बाहरी लोगों का व्यापार के लिये आना जाना लगा रहता था और यह वेश्यालय राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती देते थे। अब इस बात पर दिमाग खपाइये कि वेश्यावृत्ति के लिये जाने वाली महिलायें प्रजनन के लिये तो उस पेशे में गयी नहीं होंगी और उस दौर में गर्भनिरोधन के उपाय भी कुछ खास नहीं थे।

उस दौर में गर्भनिरोधन के उपाय नहीं थे

  जो थे भी वे अजीब और खतरनाक थे— मिस्री दस्तावेज बताते हैं कि डेढ़ हजार साल पहले वे महिला योनि में शुक्राणुओं का प्रवेश रोकने के लिये मगरमच्छ का मल, शहद, सोडियम बाईकार्बोनेट के घोल को भी भरते थे। मध्यकाल में महिला की जांघ पर वीजल नामी जानवर का अंडाशय और एक हड्डी बांध दी जाती थी। चीन में तो लेड और मरकरी का किसी तरह से घोल बना कर पिला देते थे, जिससे जान तक चली जाती थी। ग्रीस में महिला को वह पानी पिलाया जाता था, जिसमें लोहार अपने औजार ठंडे करता था।
  जाहिर है यह सब उपाय खतरनाक, असुरक्षित और गैरभरोसेमंद थे तो गर्भ तो रुकता ही था। अब अगर आप सोचते हैं उस दौर में चिकित्सा पद्धतियां नगण्य थीं तो आप गलत सोचते हैं। भारतीय भूभाग पर आयुर्वेद और मध्य एशिया और योरप में यूनानी चिकित्सा पद्धति बहुत पुरानी है। मिस्र में 2600 ईसा पूर्व इमहोतेप हुए, जिनके लिये सर विलियम ओसलर ने रियल फादर ऑफ मेडिशन कहा था।

  तो जब गर्भ रुकता था तो उसे गिराने के उपाय भी किये जाते थे— यह तब की बात है, आज की तारीख में भी ग्रामीण समाज में गर्भ गिराने के कई देशी नुस्खे प्रचलन में हैं।
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Foetus

  अब मूर साहब को दरकिनार करके खुद अपना दिमाग लगाइये कि एक हफ्ते से ले कर तीन चार या पांच महीने तक का जब गर्भ गिराया जा रहा है तो क्या वह लोगों (कम से कम गर्भ गिराने वाली महिला के तो जरूर) की नजर में आता नहीं था? वे मासिक धर्म रुकने पर क्या खुद के गर्भवती होने और फिर गिरे हुए गर्भ की अलग-अलग अवस्थाओं को जान नहीं पाती थीं कि पहले भ्रूण जोंक जैसी शक्ल में होता है और आगे क्या-क्या शेप लेता है?

  इसके सिवा एक चीज मिसकैरेज भी है जो कोई आज एकाएक प्रचलन में नहीं आया— बल्कि जब से औरत वजूद में है, तब से ही एक सामान्य प्रक्रिया के तहत होता आया है... क्या आप यह मानते हैं कि आठवीं शताब्दी से पूर्व किसी को मिसकैरेज ही नहीं होता था जो उन्हें कोख में बनने वाले भ्रूण की अलग अलग स्थितियाँ न समझ आती थीं।

  इन बातों को इस तरह भी समझिये कि तब फ्लश वाले टायलेट नहीं यूज होते थे कि भ्रूण फ्लश में बह गया... बल्कि ज्यादातर लोग खुले में जाते या इस तरह के अविकसित (शुरुआती अवस्था के) भ्रूण को फेंकते थे— तो यह कोई एसी अनजानी और अनोखी चीज नहीं थी, जो आठवीं शताब्दी में कुरान के बताने से पूर्व किसी को पता ही नहीं थी।
  यहां यह बात काबिले गौर है कि खुद कुरान इस तरह की बातें समझाने के लिये कहता है— यह चमत्कार है, ऐसा कोई दावा नहीं करता... लेकिन जब से जाकिर नाईक जैसे खुराफाती दिमाग के लोग धार्मिक किताबों में विज्ञान ढूंढने लगे हैं तब से ऐसी सामान्य बातों को भी चमत्कार बता कर ढिंढोरा पीटा जाने लगा है।

क्या वाकई में दो समन्दरों का न मिलना चमत्कार है

  कुरान से जुड़े जिस एक और चमत्कार की सबसे ज्यादा चर्चा होती है वह सूरह रहमान की 19-20 आयत से जुड़ा है, जिसमें उन दो समंदरों के मिलने का जिक्र है जो एक दूसरे में समाहित नहीं होते। यह चमत्कार दो श्रेणी में है— एक तो उसकी यह अवस्था और दूसरे यह कि जमीन पर मौजूद इस करिश्मे का पता कैसे चला।
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Gulf of Alaska

  पहले इसके न मिलने के वैज्ञानिक कारण को समझिये— यह अनोखा मिलन जिस एक जानी पहचानी जगह (मुसलमानों द्वारा प्रचारित) होता है, वह जगह अलास्का की खाड़ी है जहां ठंडा, मीठा पानी ग्लेशियरों से पिघल कर आता है और उसके सामने होता है, प्रशांत महासागर का खारा पानी... अब चूंकि दोनों तरफ के पानी की डेंसिटी, टेम्प्रेचर आदि अलग होता है तो वह आपस में नहीं मिलता और उनके जंक्शन पर झाग की दीवार सी बन जाती है।
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Same as Alaska

  सच यह है कि वह अकेली ऐसी जगह नहीं है— और भी जगहों पर जहां नदियों का (प्रदूषण रहित) मीठा साफ पानी समुद्र के खारे जल में आ कर मिलता है तो अपना अलग वजूद बनाये रखता है, लेकिन यह छोटे पैमाने पर होता है तो इसकी चर्चा नहीं होती। बाकी आप इसे अपने ही देश में संगम पर गंगा जमना के मिलन के रूप में देख सकते हैं, उत्तराखंड में कई जगहों पर ऐसे नज़ारे देख सकते हैं और बीबीसी अर्थ पर फैक्टोमेनिया प्रोग्राम देखते हैं तो इस तरह के प्रयोग खुद घर पे भी करके चेक कर सकते हैं। बाकी इसका दूसरा सच यह भी है कि यह संयोग स्थाई नहीं होता और धीरे-धीरे पानी मेल्ट हो जाता है।

ऐसा नज़ारा पानी के अलग घनत्व की वजह से होता है

  पानी के घनत्व की वजह से ऐसा होता है और इसका एक एग्जाम्पल आप जार्डन और इस्राएल के बीच मौजूद डेड सी से भी ले सकते हैं जहां की डेंसिटी इतनी ज्यादा है कि इसमें आप कभी डूब नहीं सकते। चूँकि यह कुदरत है और कुदरत को आस्तिक ईश्वर रचित मानते हैं तो उस लिहाज से यह कह सकते हैं कि ईश्वर ने बताया कि उसने ऐसा किया— बाकी इसमें चमत्कार जैसा कुछ नहीं और अगर यह चमत्कार है तो प्रकृति से जुड़ी हर चीज और हर अविष्कार एक चमत्कार है।

  अब इसके दूसरे पहलू पे आइये कि यह घटना कुरान में दर्ज कैसे हुई— कैसे लिखने वाले को जानकारी हुई तो आपको फिर अतीत में चलना होगा।

  रहस्य और रोमांच भरी यात्राओं की कहानियाँ हमेशा इंसानी दिलचस्पी का केन्द्र रही हैं। आज की तारीख में हम उन समुद्री यात्राओं पर बनी 'पाइरेट्स ऑफ कैरेबियन', 'मिस्टीरिअस आइलैंड' 'गुलिवर' टाईप फिल्मों में देख सकते हैं लेकिन पहले के जमाने में यह सब कहानियाँ लिखी जाती थीं और लोग बड़े चाव से इन्हें पढ़ते थे— ‘गुलिवर’ और ‘सिंदबाद’ इसके सटीक उदाहरण हैं।

  अगर आप चालीस से ऊपर हैं तो आपको अपने बचपन में दादी नानी से सुनी कहानियाँ याद होंगी, क्योंकि तब मनोरंजन के सीमित साधन थे और स्टोरी टेलिंग एक अति प्राचीन और महत्वपूर्ण कला थी, जो सभ्यता के शुरुआती दौर से चली आ रही है।

स्टोरी टेलिंग उन दिनों आम कला हुआ करती थी 

 
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Sindbad Stories
इन स्टोरी टेलिंग के चलन से ही फोक्स टेल तैयार होती थीं जिनमें सबसे महत्वपूर्ण होती थीं जहाजियों की कहानियाँ— उदाहरण के लिये आप सिंदबाद जहाजी को ले सकते हैं। उस दौर में
, जब मनोरंजन के बड़े सीमित साधन थे— जहाजों से लंबी लंबी समुद्री यात्राएं करने वाले लोग सैकड़ों कहानियों से लबरेज होते थे, जिनमें से कुछ उनकी कल्पना पर आधारित होती थीं (अरेबियन नाइट्स टाईप), तो कुछ निजी अनुभवों पर और कुछ दूसरे देशों की फोक्स टेल— या यूँ कह सकते हैं कि संस्कृति का आदान प्रदान।

  वे मजमों में, शराबखानों में, होटलों में और निजी जमघटों में उन कहानियों को सुनाया करते थे और इस तरह सुदूर देशों, समुद्रों और द्वीपों से जुड़ी कहानियाँ लोगों तक पंहुचती रहती थी। ईसा से साढ़े नौ सौ साल पूर्व इस्राएल में ही सोलोमन (सुलेमान) के बसाये कुछ बंदरगाही शहर थे जिनकी वजह से काफी बड़े भूगाग से उनका व्यापारिक संपर्क बना रहता था।
  तो दो तरह की संभावनायें हो सकती हैं— किसी जहाजी ने यह नजारा देखा हो और फिर इसे दूसरों तक पंहुचाया हो, दूसरे यह कि यह भी जरूरी नहीं कि यह खास अलास्का की खाड़ी के संदर्भ में हो— कहीं और भी देखा गया हो सकता है।

  इसके साथ एक तथ्य यह भी है कि मुहम्मद साहब बचपन में ही अपने चाचा के साथ शाम (सीरिया) चले गये थे कारोबारी सिलसिले में और शाम में भी बंदरगाही शहर मुख्य व्यापारिक केन्द्र थे— बाकी गुणा भाग खुद कर लीजिये।
Written by Ashfaq Ahmad

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