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बुखार क्या है

 


बुखार क्या है और यह क्यों होता है 

आमतौर पर हमारे शरीर का तापमान 98.6 फॉरेनहाइट के बीच रहता है। लेकिन कभी हमारी लापरवाही या फिर मौसम के असंतुलन या फिर कभी कभी जीवाणुओं के हमले के कारण शरीर की क्रियाओं के बीच का संतुलन बिगड़ जाता है।

बुखार आने पर शरीर का तापक्रम बढ़ जाता है जिसका कारण यह है कि हमारे शरीर मे कोई भी इनफेक्शन ( संक्रामक बैक्टीरिया व वायरस) चला जाता है तो हमारा शरीर उसका प्रतिकार करता है। बुख़ार बीमारी नहीं है, अपितु उसका लक्षण है।

बुख़ार बैक्टेरिया नहीं मारता।बैक्टेरिया को हमारे शरीर के प्रतिरोधक तत्व, जो कि एंटीबॉडीज कहलाते हैं, वो मारते हैं। बुखार आने का मतलब है कि आपका शरीर किसी बैक्टेरिया या वायरस या अनचाहा मेहमान जो आपके शरीर में घुस गया है, से लड़ रहा है।

कभी कभी बैक्टेरिया और वायरस शरीर के एंटीबॉडीज से मर जाते हैं, कभी कभी इनको मारने के लिए दवा दी जाती है, जिन्हें हम एंटीबायोटिक या एंटीवायरल (अगर वायरल संक्रमण हो तो) कहते हैं।


बुख़ार का होना बताता है कि आपके शरीर में प्रतिरोध जीवित है। जी हाँ , ज्वर शरीर की क्रिया नहीं है , प्रतिक्रिया है। प्रतिक्रिया उसके ख़िलाफ़ जो शरीर में अवैध ढंग से घुस आया है और अपनी मनमानी चला रहा है।

उसके विरोध में शरीर का मुस्तैद प्रतिरक्षा-तन्त्र उठ खड़ा हुआ है। श्वेत रक्त कोशिकाएँ आक्रोश से भरी हुई हैं। वे लड़ने के लिए तैयार हैं। उनसे तमाम रासायनिक पदार्थ जहाँ-तहाँ निकल रहे हैं।

ये पदार्थ रक्त में भी घूम रहे हैं। फिर घूमते हुए मस्तिष्क में भी अपना प्रभाव छोड़ रहे हैं। कहाँ? वहीं! हाइपोथैलेमस में। हमारे शरीर का तापमान नियंत्रक है हाइपोथैलमस...जब शरीर में सब कुछ सामान्य रहता है, तो हाइपोथैलेमस को शरीर के सामान्य तापमान पर सेट कर देता है।

जब बैक्टीरिया या वायरस शरीर पर आक्रमण करते हैं और ऊतक या कोशिकाओं को हानि पहुँचाते हैं , तो प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रियाओं में से पाइरोजेन का उत्पादन होता है। पाइरोजेन रसायन हैं जो रक्त से दिमाग तक और वहाँ से हाइपोथैलेमस अर्थात थर्मोस्टैट तक जाते हैं |


पाइरोजेन शरीर के बाहर से आ सकते हैं या शरीर के अंदर उत्पन्न हो सकते हैं। बाहरी पाइरोजेन में संक्रामक वायरस या बैक्टीरिया द्वारा उत्पादित विषाक्त पदार्थ (जहर) शामिल हैं। आंतरिक पाइरोजेन में असामान्य रसायन हैं जो ट्यूमर और प्रोटीन द्वारा उत्पन्न होते हैं जो प्रतिरक्षा प्रणाली की सामान्य प्रतिक्रिया के दौरान उत्पन्न होते हैं।

शरीर के तापमान का सेट-पॉइंट जो हाइपोथैलेमस में लगा था , ऊपर खिसक गया है। यह इशारा है शरीर के कोर के लिए कि तापमान ज़्यादा होना चाहिए , कम है। इसे बढ़ाओ। बढ़ाओ ताकि घुसपैठिये को बढ़ने में , पनपने में दिक़्क़त हो। बढ़ाओ ताकि उसकी वृद्धि के लिए अवरोध उत्पन्न हो। बढ़ाओ , बढ़ाओ , बढ़ाओ।

बुख़ार चढ़ रहा है। जाड़ा लग रहा है : यह बताते हुए कि सेट-पॉइंट ऊँचा है, उस तक शरीर, तुम पहुँचो। इसीलिए दाँत किटकिटा रहे हैं। जबड़े की मांसपेशियाँ भिंच रही हैं। शरीर काँप रहा है।

हाथों-पैरों में सिहरन पैदा हो रही है। तन तपने लगा है , चेहरा लाल हो चला है। और फिर ?पसीना-पसीना-पसीना होकर शरीर कहता है अब बस ! और नहीं ! जितना बढ़ना था ताप , बढ़ चुका मैं। और बढूँगा तो प्रतिक्रिया ज़रूरत से ज़्यादा हो जाएगी।

अरे , किसी ने एक थप्पड़ मारा है तो उसकी जान थोड़े ही ले लूँगा ! और जान लेने की कोशिश में अपनी जान जोखिम में थोड़े ही डाल दूँगा ! बुख़ार इसलिए एक हद से ज़्यादा नहीं बढ़ता सकता, नहीं तो अनर्थ हो जाएगा।

इस बढ़ोत्तरी में केवल शत्रु की हानि होगी , ऐसा कहाँ ज़रूरी है। ताप बढ़ेगा , तो जिस्म की अपनी क्रियाएँ भी प्रभावित होंगी। उनमें भी शिथिलता आएगी। वे भी मन्द पड़ सकती हैं और पड़ती हैं। ये सब बुख़ार के अपने ही पक्ष पर प्रतिकूल प्रभाव हैं।
अस्पताल में बड़ी बीमारी वाले उन लोगों को देखिए जिन्हें रोग के बावजूद बुख़ार नहीं चढ़ रहा। ये बेचारे अभागे हैं : इनके प्रतिरक्षा-तन्त्र ढंग से काम नहीं कर रहे। इनमें से एक बच्चा है , एक बूढ़ा है , एक अनियन्त्रित मधुमेह रोगी है , एक के वृक्क फेल हो चुके हैं। एक का यकृत विकारग्रस्त है। एक एच.आइ.वी. पॉज़िटिव है , उसे एड्स है।

बुख़ार जहाँ नहीं है , वहाँ प्रतिरोध नहीं है। वहाँ दुश्मन का पलड़ा पहले से ही बहुत भारी है।

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