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शकुन अपशकुन कितने वैज्ञानिक



शकुन अपशकुन कितने वैज्ञानिक?

शकुन या अपशकुन मानना एक पारंपरिक सोच पर आधारित है। अक्सर हम अपने बड़े बुजुर्गो से शकुन अपशकुन या शुभ अशुभ जैसी बातें सुनते आए हैं। क्या सच मे शुभ अशुभ होता है। जैसे कि रात में नाख़ून काटना, ग्रहण के समय बाहर ना निकलना या ग्रहण को न देखना ।

बिल्ली का रास्ता काटना इत्यादि। इन सभी को अशुभ या अपशकुन माना जाता है। बुजुर्गों की बाते तो सच ही होती थी पर उनके पीछे कोई शगुन अपशगुन या शुभ अशुभ नहीं बल्कि तर्क होते थे। जरूरत है हमें यह समझने की, कि यह सोच की उत्पत्ति कैसे हुई और क्या ये आज के युग में भी प्रभावशाली है? आइए हम इन बातों के पीछे का तर्क जानते हैं।

आइये आपको एक कहानी के माध्यम से कुछ बताता हूँ । एक बार की बात है किसी गांव मे एक गुरुजी अपने कई शिष्यों और एक प्यारी सी छोटी बिल्ली के साथ एक आश्रम में रहा करते थे गुरु जी को उस बिल्ली से बहुत लगाव था और बिल्ली को गुरुजी से ...।

गुरु जी जहां भी जाते प्रवचन में...भोजनालय में... कहीं भी तो बिल्ली गुरुजी के पीछे पीछे म्याऊं-म्याऊं करके घूमा करती थी यहां तक कि जब गुरुजी ध्यान के लिए बैठते थे तब भी बिल्ली आ कर उनकी गोद में बैठ जाती थी इस वजह से गुरुजी का ध्यान भंग हो जाता था कुछ दिनों तक तो गुरुजी सहन करते रहे लेकिन उनकी साधना में यह बिल्ली बाधा पहुंचा रही थी

इस समस्या के समाधान के लिए गुरु जी के शिष्यों ने एक तरकीब निकाली जब भी गुरुजी ध्यान के लिए बैठते तो एक-दो घंटे के लिए बिल्ली को बांध दिया जाता और इस प्रकार गुरु जी की समस्या का समाधान हो गया धीरे-धीरे समय बीता गुरूजी बूढ़े हो गए और स्वर्ग सिधार गए इसके बाद उनका शिष्य उनकी गद्दी पर बैठा और वह भी जब ध्यान करता तो उस बिल्ली को बांध दिया जाता।

एक दिन अचानक बिल्ली भी मर गई टर्निंग पॉइंट यहां से शुरू होता है जब बिल्ली मरी तो आश्रम में खलबली मच गई तब उसी आश्रम के नवीन गुरुजी ने सोचा उस बिल्ली मे कुछ ना कुछ तो था इस कारण ही मेरे पहले के गुरुजन उस बिल्ली को खूंटे से बांधा करते थे तो उस शिष्य ने एक नई बिल्ली मंगवाई और तब जाकर उसे लगा कि वह अब ध्यान कर सकता है तो मेरे मित्रों समस्या यहीं से शुरू होती है

पहले गुरु ने बिल्ली इसलिए बांधी थी क्योंकि वह उनके ध्यान में बाधा डाल रही थी बिल्ली को खूंटे से बांधने का यहां कारण भी मौजूद था लेकिन बाद के शिष्यों ने बिल्ली के मरने के बाद कई बिल्लियां लाकर खूंटे से बांधना बिना कारण के शुरू किया तो यह तार्किक क्रिया अंधविश्वास और पाखंड में बदल गई।

इसी तरह बिल्ली के रास्ता काटने वाली बात हम अपने पूर्वजों से सुनते आए हैं , कई लोगों द्वारा इसे पूरी अंधश्रद्धा से स्वीकार कर लिया जाता है तो वहीं कुछ के द्वारा इस पर हंस दिया जाता है। आप लोगो का भी कभी न कभी बिल्ली ने रास्ता जरूर काटा होगा।

आपने अपने घरवालों से सुना होगा कि बेटा थोड़ी देर बाद आगे जाना बिल्ली का रास्ता काटना अशुभ होता है। ये पुराने रीति रिवाज है लेकिन सबसे बड़ी मूर्खता वाली बात ये है कि आज भी इनको फॉलो किया जाता है आप सोच रहे होंगे इसका कारण तो बताया नही तो चलिए जानते है ऐसा क्यों करते थे तो भैया बात ये है कि 17–18वी शताब्दी में जब भारत में प्लेग और दमा महामारी फैल रही थी, और भारतवासी सदा की तरह पैदल और नंगे पांव चला करते थे।

शोध के बाद पता चला था कि बिल्लिया इन महामारी के विषाणु के फैलने का वाहक थी। उनके शरीर के बालों से प्लेग का विषाणु, मनुष्य में फैल रहा था, वे जिस रास्ते को जाती थी उस रास्ते पर उनके बालों से झड़कर विषाणु गिर जाते थे इसलिए लोगों ने उस रास्ते पर जाना ही बंद कर दिया जहां से बिल्लियां गुजर रही थी।

और फिर इसके बाद तो यह प्रथा बन गई। लोगों ने इसे पुरानी मान्यताओं के रूप में लिया। अब समझ गए न ऐसा से कोई बिल्ली आपका रास्ते काटे तो न तो दो मिनट ठहराना न अपना रास्ता बदलना। बिल्ली द्वारा रास्ता काटना और उस रास्ते को पार नहीं करना किसी जमाने में सही रहा होगा और इसके पीछे गुरुजी की बिल्ली की तरह ही कोई तार्किक कारण था जो कारण आज मौजूद नहीं है तो अब की बार बिल्ली जब रास्ता काटे तो डरे नहीं उस रास्ते को पार कर जाए मैं भी ऐसा ही करता हूं और मेरे साथ आज तक कुछ नहीं हुआ और ऐसा सोचकर निकल जाए की मैं अपने काम से जा रहा हूं और बिल्ली भी अपने किसी काम के लिए जा रही होगी

आपने अक्सर अपनी मम्मी से सुना होगा कि रात में नाख़ून काटना अपशगुन होता है आप में से कई तो बात मान लेते होंगे लेकिन कुछ नही मानते होंगे। लेकिन आपको पता है इसके पीछे की साइंस क्या कहती है ये परमपरांए आज की नही है उस युग की है जब बिजली का अविष्कार नही हुआ था उस समय नाखून काटने के लिए किसी तेज धारदार औजार की जरूरत होती थी।

उस वक्त नेलकटर जैसे शार्प टूल का भी अविष्कार नही हुआ था। हम जानते है पहले हमारे घरों में अंधेरा होने पर दिया या लालटेन का प्रयोग होता था जिससे प्रकाश पूरी तरह से घर को रोशन नही कर पाता था । अंधेरे में उस समय नाखून काटने पर कट जाने की संभावना सबसे अधिक होती थी इसलिए उस वक्त की आवश्यकता थी कि नाखून दिन में काटे जाए लेकिन समय बीत गया... दिया और लालटेन के युग से हम एलईडी लाइट के युग मे प्रवेश कर गए लेकिन नियम वही रहा और जो नियम उस वक़्त की मजबूरी थी आज वो अपशकुन बन गया। अजीब है न...।

जब भी ग्रहण पड़ता है अक्सर आपको सुनने को मिलता है आज ग्रहण के समय बाहर न निकलना... ग्रहण को देखना अशुभ होता है इसके पीछे शुभ अशुभ नही बल्कि वैज्ञानिक तर्क है...इसके पीछे का तर्क यह हैं की सूर्य ग्रहण के समय सूर्य को देखने से हमारी आँखों के रेटिना को हानि होती हैं।

ग्रहण के दौरान सूर्य से हानिकारक विकिरण निकलता है। जिससे आंखों को काफी नुकसान पहुंचता है। इससे आंखों की टिशू और आइरिस को नुकसान होता है, और आंख खराब भी हो सकते हैं। इसलिए ग्रहण को नंगी आंखो से नहीं देखना चाहिए।

लेकिन इसका मतलब ये नही की ग्रहण को देखना अशुभ होता है। ये हानिकारक तो हो सकता है लेकिन अशुभ नही। अगर आपका मन कर रहा है सूर्य ग्रहण देखने के लिए तो आप सोलर व्यूइंग ग्लास, सोलर फिल्टर या आइक्लिप्स ग्लास का इस्तेमाल कर सकते है इसके अलावा एक्स-रे से भी सूर्य ग्रहण देख सकते है। ऐसी कई रूढ़िवादी परमपरांए है जो आज तक चली आ रही है। पोस्ट लंबी हो जाएगी।

अन्ततः पुरानी बातों को तोड़ मरोड़ कर रूढ़िवादी परंपरा बना देना तो रूढ़िवादियों का धर्म सा है और इसीलिए ज्यादातर घटनायें जो किसी वजह से मना की जाती थी उनको शुभ अशुभ से जोड़ दिया गया आश्चर्य की बात तो ये है कि हमने भी बिना कुछ सोचे इसे मानना शुरू कर दिया। हम लोग केवल अंधविश्वास...अंधविश्वास चिल्लाकर अंधविश्वास का अंत नहीं कर सकते।

किसी समय कोई चीज सही थी लेकिन अब अगर हम उसे बार-बार उसी बिल्ली की तरह अपने से चिपकाए बैठे हैं तो वह चीज अंधविश्वास है। शुभ अशुभ जैसा कुछ नही होता पुरानी परंपराओ को मानना गलत नहीं, पर एक बार खुद से उसकी सार्थकता हेतू तर्क जरूर करें।

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