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धर्म यात्रा 2

धर्म यात्रा

धर्म की एक आवश्यकता बड़े समाजों के संचालन को लेकर भी थी

धर्म की एक वजह इस मानव जीवन को अनिश्चित्ता और असुरक्षा से निकालने की भी थी, जहां इसके पीछे ही कई नियम तय किये गये जिससे संगठित धर्मों में व्यवस्था संचालन निर्धारित किया जा सके और जिसकी परिणति आगे चल कर ‘हम्मुराबी संहिता’ ‘मनुस्मृति’ और ‘शरा’ के रूप में हुई।

  और तब की अगर बात करें तो धर्म या यूँ कहें कि आज के आधुनिक दौर के हिसाब से अंधविश्वास का एक शुरुआती प्रयोग किया गया था— जिसका मकसद लोगों को डरा कर काबू में रखना भी था। तब कबीलों में ओझा की हैसियत के लोग होते थे— जो इस सिलसिले के सूत्रधार होते थे और तब के भगवान, पैगम्बर ज्यादातर कबीलों के मुखिया, राजा जैसे प्रमुख लोग होते थे जो एग्जिस्ट करते थे और वह भी होते थे जो काल्पनिक होते थे, जिनकी बस कहानियाँ सुना कर उनकी मूर्ति स्थापित कर के उनकी पूजा वगैरह कराई जाती थी... जैसे इब्राहीम से ले कर इस्लाम के अवतरण काल तक अरब के अलग-अलग सभी कबीलों के अपने ईष्ट हुआ करते थे— जिनकी उन्होंने मूर्तियां स्थापित कर रखी थीं।

  आप इंका, माया, सुमेरिया, मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताओं का अध्ययन करेंगे तो उनमें भी इसी तरह के ईष्ट और इसी तरह का चलन पायेंगे— या अपने देश के ही आदिवासियों का प्राचीन इतिहास टटोलिये... सबकुछ आपको इसी अंदाज में मिलेगा।
  तब उस दौर में (खास कर मिस्री सभ्यता में, जो विज्ञान में भी काफी उन्नत थी) पिरामिड टाईप विशाल निर्माण के लिये जुटाये गये मजदूरों की चेतना पर भी इसी धार्मिक चाबुक का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे वे बे चूं चरा उसे ईश्वर की इच्छा मान कर करते रहें— वर्ना कल्पना कीजिये कि पिरामिड जैसे विशाल निर्माण बिना भारी भरकम मशीनरी के सपोर्ट के आज भी कितने मुमकिन हैं। हालाँकि इसका एक मज़बूत कारण शाषक की ताक़त और धन भी हो सकता है कई मामलों में।

 
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पैगानिक चिन्ह 
इस दौर तक सभ्यता को पंहुचने में धर्म में डर के साथ लालच का भी मिश्रण किया गया और कई तरह के कर्मकांड भी किये जाने लगे— जिसमें पूजा अर्चना के साथ यज्ञ और बलि जैसी प्रथायें भी थीं। उस दौर में कई छोटे-छोटे धर्म तो अस्तित्व में आये लेकिन यूरेशियाई रीज़न में मुख्य पहचान अगर हम सीमित शब्दों में परिभाषित करें तो पगान और इब्राहीमी धर्म को मिली। पगानिज्म जहां बहुदेववाद और मूर्ति पूजा पर आधारित था वहीं इब्राहीमी मूर्ति पूजा का विरोधी और एकेश्वरवाद पर आधारित था।

पगान और इब्राहिमी धर्म एक दूसरे के विरोधी हो कर भी सामानांतर थे  

  पगान धर्म के कर्मकांडों में बहुत कुछ आज के भारतीय धर्म से सिमिलर मिलेगा, बल्कि पूजा अर्चना, यज्ञ, बलि सब सेमेटिक धर्मों के हिसाब से देखें तो विरीधाभासी तौर पर इब्राहीम से ले कर इस्लाम के अवतरण तक चलती रही और मक्का विजय के बाद अरब में मौजूद न सिर्फ सारी मूर्तियाँ तोड़ी गयीं— बल्कि मंदिर भी ध्वस्त किये गये और खुद को पिछली रवायतों से काफी हद तक अलग किया गया, लेकिन फिर भी हज, कुर्बानी, खतना जैसी रवायतें वहीं से अडॉप्ट की।
  पगान का मूल आधार मूर्ति पूजा, प्रकृति पूजा और बहुदेववाद था, इसे आप हिंदुओं का पौराणिक पार्ट कह सकते हैं— इसका उद्गम स्थल तो आज के जर्मन को कहा जाता है पर यह उस वक्त योरप और अरब आदि में संक्रमण की तरह फैला था। जो अब्राहमिक नहीं था वह पगानी था— हालाँकि इनके जो भी ग्रंथ आदि थे वह जला दिये गये थे। इस बारे में दावे से नहीं कहा जा सकता लेकिन अनुमानतः वैदिक संस्कृति और आर्य आगे ज़रथुस्त्रवाद के नाम पे फैले इसी सेक्ट की देन थे। बाकी बोलचाल के अंदाज से ले कर प्रतीक चिन्हों की जर्मनों/ज़रथुस्त्रवादियों से सिमिलैरिटी आप खुद भी निकाल सकते हैं।

  देखिये, समझ में न आने वाली चीजों को चमत्कार समझने और प्रकृति की विध्वंसकारी शक्तियों के पीछे 'कोई है' समझने की भावना तो शायद इंसानी सफर के शुरुआती दौर से रही है लेकिन इसके पीछे वे एकदम किसी आस्मानी ईश्वर को मान्यता देते थे, यह कहना सिरे से गलत होगा क्योंकि बाद के इतिहास में कई विरोधाभासी चीजें मिलती हैं।
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पैगानिक पराभव 

  बहरहाल एक व्यापक पहचान के रूप में उभरे पगानियों और इब्राहीमियों में से पगानियों से जरथुस्त्र की विचारधारा मैच करती मिलेगी और जरथुस्त्र का सारा अवेस्ता साहित्य आपको वैदिक ज्ञान से ओतप्रोत मिलेगा। वे खुद को आर्य कहते थे और अपने सिवा बाकियों को (खास सेमिटिक वाले) अनार्य।

  पगानियों का प्रकृति पूजा, मूर्तिपूजा और बहुदेववाद तो आज के आधुनिक हिंदुत्व के समान था लेकिन जरथुस्त्र का सिद्धांत वैदिक समान मिलेगा जो एक निराकार ईश्वर को तो मानता है लेकिन उसके प्राकृतिक रूपों को भी मान्यता देता है— वे आग की पूजा इसी रूप में करते थे और जनेऊधारी थे। जरथुस्त्र के अवेस्ता साहित्य और वैदिक संस्कृत में आपको गहरी समानता मिलेगी जिससे आप यह अंदाजा लगा सकते हैं कि इनका आपसी संबंध क्या रहा होगा।

पगानियों और इब्रहिमियों का विरोधाभास

  एक अजीब विरोधाभास आपको यह मिलेगा कि जहां पगानी बहुदेववाद में यकीन रखते थे और ईश्वरीय शक्ति के प्राकृतिक रूपों को भी मानते थे वहीं इब्राहीमी कांसेप्ट सारी शक्तियों के एक केन्द्र के रूप में एकेश्वरवाद को मान्यता देता था— लेकिन बदले दौर में जहां पगानियों से ही विस्तार पाये आर्यों के मूल में एकेश्वरवाद स्थापित हुआ वहीं इब्राहीमियों ने कुछ सौ सालों में ही बहुदेववाद में यकीन बना लिया।
  हालाँकि इब्राहीमियों से मूसा के काल में एक शाखा अलग हुई— जिसने एकेश्वरवाद का सिद्धांत, उसके दूतों को अवतार, नबी, पैगम्बर ठहराते हुए बनाये रखा और बाद में इसी पदचिन्ह पर उनसे ईसा के काल में एक और शाखा अलग हुई और उसने एकेश्वरवाद को थोड़े अजीब अंदाज में अपनाया... अपने संदेष्टा को ईश्वर का बेटा ठहरा कर।

  जबकि अरब जगत में अलग-अलग कबीलों के इसी तरह के प्रकृति से जुड़े काल्पनिक देवता हुआ करते थे जिनकी मूर्तियां काबे के बाहरी सिरे में स्थापित थीं और अंदर बाकायदा सीरियन के चंद्र देवता हबल और अल इलात, अल मनात, अल उज्जा के रूप में उसका परिवार स्थापित था और बाकायदा उनकी पूजा अर्चना होती थी।

  यह सीधे तौर पर बहुदेववाद था— फिर मुहम्मद साहब के मक्का विजय के बाद भले कई पिछली (हज कुर्बानी जैसी) परंपरायें ले ली गयीं पर सीधे तौर पर एकेश्वरवाद की वापसी हुई जो मुसलमानों में अब तक चली आ रही है, यानि इब्राहीमी विचारधारा के लोग अपने मूल पर लौट आये।

  फिर आगे चल कर फारस (ईरान) भी उनके अधीन हो गया तो जरथुस्त्रवाद  भी एक तरह से लगभग खत्म हो गया। इसके मानने वाले नाम के बचे— लेकिन इब्राहीमी विचारधारा वाले भले चौदह सौ सालों से नाम से मुसलमान ही रहे हों लेकिन उनमें भी सुन्नी शिया अहमदिया, देवबंदी, बरेलवी जैसे ढेरों मत विभाजन हुए।

  जबकि ईसा से शायद दो हजार साल पहले उन आर्यों ने सिंधू के रास्ते भारत में प्रवेश किया था और कालांतर में पूरी भारत भूमि पर फैल गये। उनके पास दिमाग था, साधन थे— उन्हें स्थापित होने में उतनी कठिनाई न हुई। उन्होंने अपनी संस्कृति को स्थानीय संस्कृति के साथ मिक्स कर दिया। जैसे उदाहरण के लिये कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति में शिव का मुख्य स्थान था, और खरे शब्दों में कहा जाये तो कभी शिवलिंग उपासकों की हंसी उड़ाने वालों ने शिव को ही हाईजैक कर लिया।

आर्य संस्कृति का भाषाई संपर्क

  खुद को आर्य कहने वाले पश्चिम की तरफ से आये थे— यह दावा करना बड़ा मुश्किल है लेकिन अगर हम इसका भाषाई संपर्क खोजें तो इतिहासकारों और भाषाविज्ञानियों के मुताबिक संस्कृत का सबसे प्राचीन रूप, जिसे हम ऋग्वैदिक संस्कृत कहते हैं— के सबसे पहले उपयोग का लिखित साक्ष्य उत्तर सीरिया में मिलता है। इतिहासकार बताते हैं कि 1500 से 1350 ईसा पूर्व के दौरान यूफ्रेटस और टिगरिस नदी घाटी के ऊपरी इलाके में मितन्नी नाम का एक राजवंश हुआ करता था जिसके हर राजा का नाम संस्कृत में हुआ करता था। यह इलाका आज के सीरिया, ईराक और तुर्की में बंटा हुआ है। पुरुष, दुश्रत, सुवर्दत्त, सुबंधु जैसे नाम इनके राजाओं और स्थानीय सामंतों के हुआ करते थे। वसुकन्नी अर्थात वसुखन्नी इनके राज्य की राजधानी थी।

 
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मितन्नी नगर 
वैदिक सभ्यता की तरह मितन्नी संस्कृति में भी रथ युद्ध एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं और इन रथों में जुटने वाले घोड़ों के प्रशिक्षण पर इस संस्कृति का ग्रन्थ दुनिया में सबसे पुराना दस्तावेज माना जाता है। मज़े की बात यह है कि वेदों से भी प्राचीन माने वाले इस ग्रन्थ में एक
, त्रय और अश्व जैसे उन शब्दों का उल्लेख मिलता है जो संस्कृत के हैं ये जिन देवताओं को मानते थे उनमे कुछ स्थानीय देवताओं के अलावा इंद्र, मित्र, वरुण और नासत्य (अश्विनी कुमार) भी शामिल थे— जिनका ज़िक्र 1380 ईसा पूर्व की एक प्रतिद्वंद्वी राजा के साथ की गयी मितान्नियों की एक संधि में भी मिलता है। इसी आधार पर लेखक डेविड एंथनी अपनी किताब ‘द हार्स, द व्हील एंड लैंग्वेज’ में कहते हैं न केवल ऋग्वैदिक संस्कृत पश्चिमोत्तर भारत में ऋग्वेद की रचना से पहले अस्तित्व में थी बल्कि जिन धार्मिक देवताओं का उल्लेख है, वे भी पहले ही अस्तित्व में आ चुके थे।
  इसे हम इस तरह भी समझ सकते हैं कि संस्कृत दरअसल जिस भाषा परिवार से निकली है उसका आधार प्रोटो इंडो यूरोपियन नाम की एक आदिम भाषा थी। समय के साथ इस भाषा ने प्रोटो इंडो इरानियन नाम की एक और भाषा को जन्म दिया— इसके नाम से ही जाहिर है कि यह उत्तरी भारत और ईरान के इलाके में विकसित हुई। एक मान्यता के मुताबिक ईसा से करीब दो हजार साल पहले प्रोटो इंडो इरानियन भाषा को बोलने वाले शुरुआती लोग आज के कजाकस्तान और इसके आसपास के इलाके में रहा करते थे। मध्य एशिया के इस क्षेत्र में बसने वाले इन लोगों के समाज से धीरे-धीरे एक शाखा अलग हुई जिसने प्रोटो इंडो इरानियन छोड़कर शुरुआती संस्कृत में बोलना शुरू किया। इनमें से कुछ लोग तो पश्चिम की तरफ उस इलाके में आ गये— जो आज सीरिया है और कुछ लोग पूर्व की तरफ बढ़ते हुए पंजाब के इलाके में पहुंच गये।
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मितन्नी राजवंश 

पूरब की तरफ बढ़े संस्कृत वाचक ही आर्य कहलाये

  डेविड एंथनी के मुताबिक जो लोग पश्चिम की तरफ बढ़े— उन्हें शायद सीरिया के क्षेत्र में राज कर रही सत्ता ने अपना सहयोगी बना लिया। रथकला में निपुण ये लोग वही भाषा बोलते थे जो उनके समुदाय के दूसरे साथी पूर्व की तरफ बोल रहे थे और जो बाद में ऋगवेद में दिखाई दी। इन योद्धाओं को मर्य कहा जाता था— यही शब्द इंद्र के सहयोगी योद्धाओं के लिए ऋगवेद में भी मिलता है। माना जाता है कि ऋगवैदिक संस्कृत बोलने वाले इन लोगों ने बाद में विद्रोह कर दिया और मितन्नी राजवंश की स्थापना की। धीरे-धीरे वे स्थानीय संस्कृति में रच बस गये... वे हर्रियन नाम की भाषा बोलने लगे। लेकिन कुछ राजसी नाम, रथ शास्त्र से जुड़ी तकनीकी शब्दावलियां और इंद्र, वरुण, मित्र और नासत्य जैसे देवता उनके जीवन में महत्वपूर्ण बने रहे।
  उधर जो समूह पूरब की तरफ बढ़ा था और जिसने बाद में ऋगवेद की रचना की— उसे अपनी संस्कृति को बचाये रखने में सफलता मिली। जिस भाषा और धर्म को वे इस महाद्वीप में लाये, उसने जड़ें पकड़ लीं… और समय के साथ ये जड़ें इतनी मजबूत हो गईं कि संस्कृत इस भूभाग के बड़े हिस्से में बोली जाने लगी। 

 
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हड़प्पा संस्कृति 
एक तरह से इन्हीं लोगों के लिये हम आर्य शब्द प्रयुक्त करते हैं। इन्हें उत्तर भारत की आदिवासी आबादी के साथ समायोजित करने में तो खास कठिनाई न पेश आई लेकिन दक्षिण भारत के लोगों के साथ एक लंबे काल तक उनका युद्ध चला है और उनके बीच का मतभेद आपको आज भी लिंगायत जैसे विवादों में मिल जायेगा।
  फिर भी विवादों सहित वे पूर्वी देशों तक फले फूले लेकिन आगे चल कर उनके सिद्धांतों से एडजस्ट न कर पाने की वजह से ही जैन, बौद्ध और सिख अलग शाखाओं में बंटे... जिनमें से बौद्ध धर्म काफी फला फूला और आज भी पूर्वी एशिया में मुख्य धर्म है।
Written by Ashfaq Ahmad

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