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धर्म यात्रा 5

धर्म यात्रा 5

क्रुसेड  के नाम पर पहली बार जंग में बच्चों का इस्तेमाल हुआ

चौथे क्रूसेड का आह्वान 1202 में पोप इन्नोसेंट तृतीय ने किया था जो दो भागों में बंटे इसाई समाज को एक करना चाहता था और मुसलमानों को पवित्र भूमि से निकाल देना चाहता था। इस युद्ध में भी कई राजा शामिल हुए और बेतरह खून खराबा हुआ। इसके बाद 1212 में फ्रांस में स्टीफन नाम का एक किसान हुआ, जिसने खुद को ईशदूत बता कर आह्वान किया कि उसे ईश्वर ने मुसलमानों को परास्त करने भेजा है और यह पराजय बच्चों के हाथों होगी।
धर्म यात्रा 5
Children's Crusade
  तीस और बीस हजार बच्चों के दो दल फ्रांस और जर्मनी से चले— जिसमें हजारों बच्चे समुद्र में डूब गये और बाकी सिकंदरिया में दास बना कर बेच दिये गये और हजारों वापसी के सफर में मारे गये। 1228 में एक और क्रूसेड के बाद सम्राट फ्रेडरिक ने जेरुसलम और आसपास के क्षेत्र जीत लिये  लेकिन जल्दी ही यह इलाके मुसलमानों ने फिर जीत लिये— इसके बाद 1248 और 1270 में दो क्रूसेड और लड़े गये और उनमें भी इसी तरह कत्लेआम हुआ। इन युद्धों की खास बात यह थी कि इनमें इसाई खुद भी बड़ी तादाद में मरे और हारे।

  जिस येरुसलम के लिये इतना सब होता रहा— आज के मुसलमान भले उसे अपनी संम्पत्ति और यहूदियों को किरायेदार मानते समझते हों लेकिन वह जगह हमेशा से उन्हीं की थी जहां इसहाक और याकूब की संतानों ने दबदबा कायम किया था... मूसा के वक्त में मिस्र से भाग कर उनके लोगों ने इसे बाकायदा एक देश के रूप में आबाद किया था और यह भी एक सच है कि जितना कत्लेआम यहूदियों का हुआ, उतना अन्य किसी कौम का नहीं हुआ।

जेरुसलम मुसलमानों, ईसाईयों और यहूदियों के बीच झगडे की जड़ है

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Oldest Mount Temple
जेरूसलम मुसलमानों
, ईसाइयों, यहूदियों के बीच आज तक झगड़े की जड़ रहा है। जेरुसलम में स्थित, मुसलमान जिसे मस्जिदे अक्सा कहते हैं (मक्का फतेह से पहले तक वे उसी की ओर रुख करके नमाज पढ़ते थे), उसे यहूदी दाऊद (डेविड) के बेटे सुलेमान (सोलोमन) का बनवाया माउंट टेम्पल (सिनेगॉग)... उनकी मान्यता है कि एक दिन उनके मसीह (उनके ग्रंथों में उल्लेखित, वे ईसा को मसीह नहीं मानते) आयेंगे और मुसलमानों ने उनके पवित्र स्थल को आजाद करायेंगे जबकि मुसलमान इसे आदम के वक्त बनाई मस्जिद मानते हैं।

  वे सोलवहवीं सदी ईसापूर्व में महान बहिर्गमन (ग्रेट एग्जोड्स) की घटना के बाद वहां बसे थे, लेकिन यह क्षेत्र ऐसा था जहां औपनिवेशिक काल तक लगातार लड़ाइयां चलती रहीं और यहूदी बार-बार मारे भगाये जाते और फिर बसते रहे। उनमें खुद दो बड़ी जातियों  (इजराइलों और यहूदा) का संगम था, जो खुद भी लड़ती रहती थीं। सोलोमन का काल उनके लिहाज से सुनहरा दौर था। उनकी फूट की वजह से ही उन पर ज्यादातर दूसरों का अधिपत्य बना रहता था।
  722 ईसापूर्व में शुलमानु अशरिद पंचम ने उन पर चढ़ाई करके कब्जा कर लिया। 610 ईसापूर्व में खल्दियों का अधिपत्य हो गया। इसके बाद 550 ईसापूर्व में ईरान के हखामनी साम्राज्य का दौर आया जब सम्राट कुरूश ने खल्दियों को हरा कर वहां अपना कब्जा कर लिया लेकिन ईरानी उदार विचारधारा के थे। उन्होंने न सिर्फ यहूदियों को स्वाधीनता दी बल्कि जेरुसलम के मंदिर के पूर्व पुजारी के पौत्र योशुना और दाऊद के निर्वासित वंशज जेरुब्बाबल को उनकी लूटी हुई संपत्ति दे कर जेरुसलम में बसाया और अपने खर्च से उस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।

जब जेरुसलम में बार बार यहूदियों की लाशें गिरीं   

  330 ईसापूर्व सिकंदर ने हखामनी साम्राज्य का अंत कर दिया और उसके ही सेनापति तोलेमी प्रथम ने 320 ईसापूर्व में हमला करके इजराईल और यहूदा दोनों राज्यों में कब्जा कर लिया और 198 ईसापूर्व में दूसरे यूनानी परिवार सेलुकस राजवंश का एंटिओकस चतुर्थ राजा बना— जिसने जेरुसलम में हुए बलवे से नाराज हो कर हजारों यहूदियों को कत्ल करवा दिया, मंदिर को लूट लिया और शहर की चारदीवारी ध्वस्त करा कर शहर सेना के हवाले कर दिया... जहां यहूदी धर्म ही अपराध घोषित हो गया, तौरात की जो भी प्रतियाँ मिलीं, जला दी गयीं और मंदिरों में यूनानी मूर्तियां स्थापित कर दी गयीं।

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इसके बाद 141 ईसापूर्व में एक यहूदी सेनापति साइमन ने यूनानियों को हरा कर दोनों राज्यों को एक करके अपनी आजादी की घोषणा कर दी लेकिन यह आजादी बस 78-80 वर्षों तक बनी रही। फिर 66 ईसापूर्व में रोम के जनरल पांपे ने जेरुसलम के साथ पूरे देश पर अधिकार कर लिया। उस जंग में 12000 यहूदी कत्ल किये गये। इसके बाद 135 ई० में रोम सम्राट हद्रियन ने यहूदियों से रुष्ट हो कर एक-एक यहूदी को कत्ल करवा दिया— शहर की एक एक ईंट गिरवा कर जमीन पर हल चलवा दिया और उसी जमीन पर एलिया कावितोलिना नामी रोमी नगर निर्माण कराया।


  नगर के मुख्यद्वार पर रोम के प्रधानचिन्ह सुअर की मूर्ति स्थापित की गयी और घोषणा कर दी गयी कि यहां कोई यहूदी कदम नहीं रख सकता। इसके 200 साल बाद इसाई सम्राट कोंटेस्टाईन ने इसका नाम फिर जेरुसलम प्रचारित किया और यहां स्थितियों में बदलाव हुआ।

जेरुसलम में मुसलमानों का आगमन

 
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Islamic Arrival to Jerusalem
मुसलमान इस राज्य में तब पंहुचे जब
636 में खलीफा उमर ने रोमनों को पराजित करके पूरे फिलिस्तीन, जिसमें यहूदा और इज्राइल दोनों थे— पर कब्जा कर लिया। उस वक्त की एक घटना बड़ी प्रचलित है कि जब उमर अपने साथियों के साथ यहूदियों के उस प्राचीन मंदिर गये तो उसे कूड़ा करकट और गंदगी से भरे पाया। तब अपने हाथों से सफाई करके उन्होंने उसे यहूदियों को सौंपा। तब यहूदियों मुसलमानों के बीच उस प्रार्थनास्थल को लेकर विवाद नहीं था... यह विवाद उमय्यद सल्तनत के दौरान (उन्होंने इसे बनवाया था) पनपा था, जिसका लक्ष्य सत्ता विस्तार और उसकी स्वीकृति थी... तब से आज तक कायम है। तब औपनिवेशिक काल तक ज्यादातर वहां मुसलमानों की हुकूमत रही।

  इसके साथ दो प्वाइंट और गौरतलब हैं— ईसा के आगमन से पूर्व जब बौद्ध मत का प्रचार चरम पर था तब यह विचारधारा पूरे पश्चिमी एशिया तक पंहुची थी और इससे प्रभावित हो कर यहूदियों के बीच ही एस्सेनी नामक संप्रदाय की स्थापना हुई। हर एस्सेनी उन्हीं सब नियमों का पालन करता था— पशुबलि, मांसभक्षण और मदिरापान वर्जित थे और उन्हें दीक्षा के समय यह प्रार्थना करनी पड़ती थी— 'मैं परमात्मा का भक्त रहूँगा, मनुष्य मात्र के साथ सदा न्याय का व्यवहार करूँगा, किसी को हानि नहीं पंहुचाऊंगा, न ही कभी हिंसा करूँगा। सदा मनुष्य मात्र के साथ अपने वचन का पालन करूँगा, सदा सत्य से प्रेम करूँगा।'
  और इसी दौर में वैदिक हिंदू दर्शन से प्रभावित एक और विचारशैली ने जन्म लिया था जिसे क़ब्बालह कहते हैं। जिनके सिद्धांत हैं— ईश्वर, अनादि, अनंत, अपरिमित, अचिंत्य, अव्यक्त और अनिर्वचनीय है। वह अस्तित्व और चेतना से भी परे है— उस अव्यक्त से किसी प्रकार व्यक्त की और अचिंत्य से चिंत्य की उत्पत्ति हुई। मनुष्य परमेश्वर के केवल इस दूसरे रूप का ही मनन कर सकता है।
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Kabbalah Phylosophy

  कब्बालह की किताबों में योग की विविध श्रेणियों, शरीर के भीतर के चक्रों और अभ्यास के रहस्यों का वर्णन है। यह बताने का मकसद यह है कि जिन्हें यह लगता है कि अरब के लोगों को सबकुछ एक पैगम्बर ने बताया था— उन्हें यह पता चले कि उनके काल से भी 600 साल पहले इस तरह की चीजें और ज्ञान पूरे पश्चिमी एशिया और योरप तक फैल चुका था।


वैज्ञानिक क्रांति ने योरोप को अँधेरे से बाहर निकाला

  जब तक इसाई समाज पर पोप और चर्चों का प्रभुत्व रहा— तब तक वे कट्टर भी बहुत रहे... लेकिन कोपरनिकस, ब्रूनो और गैलीलियो ने उस प्रभुत्व को तोड़ दिया और वे जड़ता से निकलने में कामयाब रहे। आज की तारीख में ज्यादातर इसाई जिंदगी में कभी कभार, या बस खास मौकों पर ही चर्च जाने वाले इसाई हैं जो बाइबिल को चंपक कथा से ज्यादा नहीं मानते जिसे उन्होंने चर्चों तक सीमित कर दिया है।
  यही वजह है कि बीसवीं शताब्दी के अंत से हुए नेट के प्रचार प्रसार के साथ उस पर अपने धर्म की बड़ाई वाला कंटेंट, वीडियोज और पता नहीं किस-किस तरह की फर्जी कहानियाँ, दावे परोसते रहने वालों में इसाई/यहूदी बहुत पीछे हैं (जो बाकी सारी चीजों में बहुत आगे हैं) और मुस्लिमों का (जो बाकी चीजों में फिसड्डी हैं) नेट पे बोलबाला है, जबकि उनकी देखादेखी अब हिंदू भी (यह भी बाकी चीजों में फिसड्डी नंबर दो हैं) कंपटीशन में उतरने लगे हैं।

  अब वर्चुअल वर्ल्ड से ले कर रियल वर्ल्ड तक थोड़ा इनके दावों को परखते हैं— इनकी टैगलाईन 'साईंस ने आज बताया है कि फलाँ काम ऐसे करने चाहिये, हमारे हुजूर साहब ने तो चौदह सौ साल पहले एसा बता दिया था'.— 'हमारे ऋषि मुनि ने तो हजारों साल पहले बता दिया था'... इसका क्या अर्थ निकालते हैं आप? वे लोग डॉक्टर थे, इंजीनियर थे, वैज्ञानिक थे?

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