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हिग्स बोसॉन

 


हिग्स बोसॉन या गॉड पार्टिकल क्या है? 

हिग्स बोसॉन से कोई परिचित न हो यह संभव है, लेकिन किसी ने गॉड पार्टिकल के बारे में पढ़ा सुना न हो ये जरा मुश्किल है। यहाँ तक की वे भी जो कभी भौतिक विज्ञान की कक्षा में नहीं गए इस नाम से भली भांति परिचित हैं।

क्योंकि यह नाम लम्बे समय तक मीडिया की सुर्ख़ियों में बना रहा है। इस नाम के गॉड अर्थात ईश्वर जुड़ा होने के कारण यह धार्मिक लोगों का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहा है। भले ही उनमें से अधिकतर क्वांटम भौतिकी की मूलभूत अवधारणाओं से भी परिचित न हों लेकिन इसके नाम के साथ ईश्वर जुड़ा होने के कारण वे इसको ईश्वर अथवा किसी दिव्य ब्रह्मांडीय शक्ति के घोतक के रूप में लेते हैं।

और इस आधार पर वे यह दावा करने से भी नहीं चूकते कि देखो विज्ञान भी ईश्वरीय सत्ता को स्वीकार करता है। तो क्या वास्तव में हिग्स बोसॉन को यह नाम किसी ईश्वरीय गुण अथवा शक्ति प्रदर्शित करने के कारण मिला है?

असल में हिग्स बोसॉन पार्टिकल फिजिक्स के स्टैंडर्ड मॉडल का एक मूलभूत कण है। जिसकी सम्भावना एक समाधान के तौर पर 1964 में पीटर हिग्स और उनके साथी वैज्ञानिकों ने जताई थी। उस समय क्वांटम फील्ड थ्योरी पर काम कर रहे वैज्ञानिक एक समस्या से जूझ रहे थे कि कणों में द्रव्यमान कहाँ से आता है?

और क्यों कुछ कण द्रव्यमान रहित होते हैं? लगभग एक दशक से ज्यादा समय तक वैज्ञानिकों को इस समस्या ने उलझा के रखा था। पीटर हिग्स और उनके साथी वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए इस समाधान ने इस समस्या को पहेली के आखिरी टुकड़े की तरह हल कर दिया।

इस समस्या के समाधान के रूप में उन्होंने एक ऐसे क्षेत्र की परिकल्पना प्रस्तुत की जो कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है और जो कण इस क्षेत्र से क्रिया करते हैं उसके फलस्वरूप उनमें द्रव्यमान आ जाता है। जो कण हिग्स क्षेत्र से जितना अधिक क्रिया करता है उसमें उतना अधिक द्रव्यमान आ जाता है।

फोटोन चूँकि हिग्स क्षेत्र से बिल्कुल क्रिया नहीं करता इसलिए यह द्रव्यमान रहित होता है। यही कारण है कि प्रकाश की रफ़्तार दुनिया में किसी भी चीज से तेज है। हिग्स क्षेत्र से कणों की क्रिया के दौरान जो कण उत्पन्न होता है उसे हिग्स बोसॉन नाम दिया गया।

हालाँकि हिग्स क्षेत्र के प्रयोग से भौतिकी की बहुत बड़ी समस्या हल हो गई थी लेकिन विज्ञान के लिए अभी यह एक अवधारणा ही थी जिसे अभी तक प्रयोगों के द्वारा सिद्ध नहीं किया गया था। भविष्य की खोजों के लिए के ठोस आधार तैयार करने के लिए इसका प्रयोगों द्वारा सिद्ध होना जरूरी था।

लेकिन इसकी प्रयोगों द्वारा पुष्टि करना आसान नहीं था। इसकी पुष्टि के लिए एक बहुत भारी क्षमता के कण त्वरित्र की आवश्यक्ता थी ताकि कणों को लगभग प्रकाश की गति से गतिमान किया जा सके और फिर उनका टकराव करवाकर प्राप्त आंकड़ों को जांचा जा सके।

सत्तर के दशक में इस भारी क्षमता के कण त्वारित्र के निर्माण के बारे में सोचना भी मुश्किल था। इसके लिए जिस तकनिकी कुशलता, श्रम और धन की आवश्यक्ता थी वह किसी एक देश के बस की बात नहीं थी। इस कारण से लगभग आधी शताब्दी तक इसकी प्रयोगों द्वारा पुष्टि नहीं की जा सकी।

हालाँकि अमेरिका ने एक समय इस क्षमता के कण त्वरित्र के निर्माण का बीड़ा उठाया था, इसका काम काफी हद तक आगे भी बढ़ चुका था लेकिन 1993 में इस परियोजना को अज्ञात कारणों से बीच में ही बंद कर दिया गया।

फिर आखिरकार यूरोपियन देशों की एक सहयोगी संस्था CERN के द्वारा स्विट्ज़रलैंड और फ़्रांस की सीमा पर 27 किलोमीटर लम्बी सुरंग में निर्मित दुनिया के सबसे बड़े कण त्वारित्र LHC में इसकी खोज के लिए प्रयोग शुरू हुए।

और 4 जुलाई 2012 को वैज्ञानिकों ने इसके खोजे जाने की अधिकारिक तौर पर पुष्टि कर दी। LHC में प्रयोग शुरू होने से पहले और खोजे जाने तक यह खबर लगातार मीडिया की सुर्ख़ियों में रही। दुनिया भर के मीडिया हलकों में हिग्स बोसॉन के लिए “गॉड पार्टिकल” नाम का जमकर प्रयोग किया गया। आखिर यह नाम आया कहाँ से?

इस नाम के जन्म की कहानी कुछ साल पीछे 1990 में जाती है जब नोबेल पुरूस्कार प्राप्त भौतिक विज्ञानी लीओन लेडरमेन अपनी नयी पुस्तक प्रकाशित करवाने जा रहे थे। इस पुस्तक में हिग्स बोसॉन की खोज में आ रही कठिनाइयों का जिक्र था।

इस कण की खोज में आ रहीं विकट कठिनाइयों को व्यंग्य के रूप में व्यक्त करने के लिए वे इस पुस्तक का शीर्षक “गॉडडैम पार्टिकल” रखने के बारे में विचार कर रहे थे। लेकिन उनका प्रकाशक इस नाम से संतुष्ट नहीं था, वह इसे और भी अधिक सनसनीखेज बनाना चाहता था।

अतः उसके सुझाव पर इसका शीर्षक गॉडडैम पार्टिकल से बदलकर “द गॉड पार्टिकल” कर दिया गया। हालाँकि इसके पीछे भी उसकी भावना इसकी खोज में आ रही कठिनाइयों को व्यंग्य रूप में व्यक्त करने की ही थी।

लीओन लेडरमेन की पुस्तक प्रकाशित होते ही सनसनीखेज ख़बरों के लिए सदा लालायित रहने वाली मीडिया को इस नाम के रूप में एक बहुत बढ़िया साधन मिल गया। इसके बाद से हिग्स बोसॉन की खोज से सम्बंधित लगभग सभी ख़बरों को गॉड पार्टिकल की खोज के नाम से मीडिया पर परोसा जाने लगा।

जाहिर सी बात है हिग्स बोसॉन जैसे बोरिंग और अजीबोगरीब नाम की अपेक्षा गॉड पार्टिकल नाम ज्यादा लोगों का ध्यान खींचने में सक्षम था।

आम लोग जिनके लिये धर्म उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था जब अख़बारों में पढ़ते थे और टीवी पर सुनते थे कि वैज्ञानिक खोज रहे हैं गॉड पार्टिकल तो उन्हें ऐसा आभास होता था कि शायद विज्ञान शायद ईश्वर को खोजने के करीब पहुँच गया है।

या फिर शायद इस कण को गॉड पार्टिकल नाम देने के पीछे विज्ञान की मंशा इसके साथ जुडी किसी ईश्वरीय शक्ति को व्यक्त करने की है। इस नाम के रूप में धार्मिक लोगों को अपने भ्रमों को न्यायोचित ठहराने का एक सुनहरा अवसर मिल गया। वे बात बात में कहने लगे देखो अब तो विज्ञान भी गॉड पार्टिकल खोज रहा है।

इस नाम ने धार्मिक लोगों को भले ही खुश होने का एक अवसर दिया हो लेकिन वैज्ञानिक मीडिया द्वारा अपने छुद्र स्वार्थ के लिए प्रचारित इस नाम से जरा भी खुश नहीं थे। इसकी खोज से जुड़े कई वैज्ञानिक विभिन्न अवसरों पर मीडिया के इस गैरजिम्मेदाराना रवैये के लिए नाराजगी जता चुके हैं और यह स्पष्ट कर चुके हैं कि हिग्स बोसॉन का गॉड से कुछ लेना देना नहीं है।

तो जबकि वैज्ञानिक यह सपष्ट कर चुके हैं तो बेहतर है आप इसे हिग्स बोसॉन ही कहिये। यदि ये नाम आपको कठिन लगता है तो इसे सिम्पली मासोन भी कह सकते हैं। पर इसे गॉड पार्टिकल मत कहिये क्योंकि इसकी पुष्टि प्रयोगों में हो चुकी है पर ईश्वर की अवधारणा अभी भी एक अदद प्रमाण की बाट जोह रही है।

Written by Arpit Dwivedi

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