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क्रमिक विकास के प्रमाण भाग 2

 



क्रमिक विकास के क्या प्रमाण हैं 


आँख जीवों की एक बेहद महत्वपूर्ण इंद्री है। लेकिन मानव समेत तमाम थलचरों की आँखें भी डिजाईन सम्बन्धी खामियों से मुक्त नहीं है। आँख की कार्यविधि मोटे तौर पर बिल्कुल किसी कैमरे जैसी ही है जिसमें एक उत्तल लेंस होता है जो सामने से आती रौशनी को एकत्रित कर पीछे पर्दे पर उसकी एक छवि बनाता है जिसे फोटोग्राफिक फिल्म अथवा सेंसर द्वारा कैद कर लिया जाता है जिससे बाद में वही छवि पैदा की जा सकती है।


आपको अपनी आँखों की कार्यकुशलता पर गर्व हो सकता है लेकिन कोई भी कैमरा निर्माता अपने कैमरों में आपकी आँखों में मौजूद डिजाईन सम्बन्धी भूल नहीं कर सकता। सपने में भी नहीं।

आपकी आँखों का रेटिना जहाँ छवि बनती है में प्रकाशसंवेदी कोशिकाओं का एक समूह है, जो प्रकाश को ग्रहण कर उस सुचना को तंत्रिकाओं के एक जाल के जरिये मस्तिष्क तक पहुंचाती हैं। यहाँ तक तो सब ठीक है लेकिन समस्या यह है कि ये उल्टा है। यानी इसका प्रकाशसंवेदी हिस्सा भीतर की तरफ है और तंत्रिकाओं का जाल बाहर की ओर।

प्रकाशसंवेदी कोशिकाओं तक प्रकाश रेटिना की पिछली दिवार से टकराकर पहुँचता है, जहाँ तक पहुँचने के लिए इसको तंत्रिकाओं के जाल से होकर गुजरना पड़ता है और यहाँ तक की इसके मध्य में एक ब्लाइंड स्पॉट भी मौजूद है जिससे प्रकाश पार नहीं हो पाता। यहाँ सभी तंत्रिकाएं आकर एकत्रित होती हैं और किसी सिंकहोल की तरह रेटिना की दीवार से बाहर निकल कर मस्तिष्क तक जाती हैं।



लेकिन इतनी बाधाओं और बीच में एक ब्लाइंड स्पॉट के मौजूद होने के बावजूद हमें देखने में कोई समस्या क्यों नहीं होती? कारण है आपका मस्तिष्क, जो एक कुशल ऑनलाइन फोटोएडिटर की तरह कार्य करता है और खाली हिस्सों को भी छद्म जानकारीयों से भर देता है। आप जो कुछ भी आँखों से देखते हैं उसका कुछ हिस्सा मस्तिष्क द्वारा निर्मित है।

आँखों के इस तरह निर्मित होने की वजह भी इसके क्रमिक विकास में छुपी है। आँख तमाम सुधारों से होती हुयी आज अपने वर्तमान स्वरुप में पहुंची है। प्रारंभ में जीवों में कुछ प्रकाशसंवेदी अंग विकसित होने शुरू हुए। इन अंगों से आँखों की तरह स्पष्ट नहीं देखा जा सकता था ये मात्र रौशनी और अँधेरे के फर्क को महसूस करने में मदद करते थे।

विकासक्रम के किसी मोड़ पर कुछ जीवों में ये प्रकाशसंवेदी अंग उलटकर भीतर की ओर विकसित होने लगे। चूँकि उस समय तक लेंस का विकास नहीं हुआ था अतः इससे जीवों की प्रकाश को अनुभूत करने की क्षमता पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा और लिहाजा आगे भी यह इसी प्रकार विकसित होता रहा और इसके बहुत बाद में जाकर जब एक लेंसयुक्त आँख विकसित हुयी तब भी यह डिजाईन वैसा का वैसा ही रहा। डिजाईन के लिहाज से ऑक्टोपस की आँख किसी भी थलचर जीव की आँख से बेहतर है।

ठीक इसी तरह स्तनपायी जीवों में पुरुष जननांग भी डिजाईन की खामी से जूझ रहे हैं। पुरुष जननांगों से शुक्राणुओं को शिश्न तक पहुँचाने वाली नलिका सीधे शिश्न में न जाकर मूत्राशय की नलिकाओं का चक्कर लगाकर शिश्न तक पहुँचती है। केवल स्तनपायी जीवों में ही पुरुष जननांग बाहर की ओर पाए जाते हैं। बाकी सभी जीवों में ये पेट के भीतर स्थित होते हैं। विकासक्रम ने ही इनको यहाँ पहुँचाया है। जिसका कारण है स्तनपायी जीवों के शरीर का तापमान जो शुक्राणुओं के विकास के लिए उपयुक्त नहीं है।

लेकिन पुरुष जननांगों के बाहर आ जाने के बावजूद शुक्राणुवाहिका आज भी अपने मूल मार्ग का अनुसरण कर रही है। चूँकि इससे इसकी कार्यप्रणाली में कोई विशेष बाधा पैदा नहीं हुयी इसलिए यह डिजाईन आज भी इसी तरह चला जा रहा है।

लेकिन भले ही इससे अधिकांश जीवों को कोई विशेष कठिनाई नहीं हुयी हो लेकिन फिर भी कुछ जीवों के लिए यह कई बार बहुत समस्या पैदा कर देती है। यहाँ तक कि उन्हें अपनी जान से हाथ भी धोना पड़ सकता है। मनुष्य भी उन जीवों में से एक है।



पुरुष जननांग मानव भ्रूण के प्रारंभिक काल में पेट में ही विकसित होते हैं और भ्रूण के विकास के आखरी दिनों में पेट से अपने नियत स्थान का सफ़र शुरू करते हैं। कई बार बच्चे के जन्म के बाद उसका एक अथवा दोनों जननांग अपनी जगह पर नहीं पहुँच पाते जिसको कई बार ऑपरेशन से बाहर लाना पड़ता है।

इससे सम्बंधित समस्याओं का अंत यहीं नहीं होता। जननांगों के इस सफ़र के कारण बनी इन्गुइनल कैनाल की दीवारें भी समय के साथ कमजोर पड़ जाती हैं और बहुत से मामलों में ये इन्गुइनल हर्निया का कारण बनती हैं जो अधेड़ मर्दों की एक प्रमुख बीमारी है। डिजाईन की इस खामी की वजह से प्रति वर्ष लाखों लोग इस रोग से पीड़ित होते हैं।

वर्तमान में इसका मेडिकल उपचार सुलभ होने के कारण आज इस रोग की भयावहता का पता नहीं चलता। जरा सोचिये पुराने समय में जब इसका कोई इलाज उपलब्ध नहीं था कितने मर्दों ने इसके कारण तड़पते हुए असमय अपनी जान गंवाई होगी। यह भयानक भूल एक बुद्धिमान निर्माता के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाती है।

इसके साथ ही अवशेषी अंग भी क्रमिक विकास का एक बढ़िया प्रमाण हैं जो एक बुद्धिमान निर्माता पर सवाल खड़े करते हैं। लगभग सभी जीवों में कुछ अंग अथवा उनके अवशेष ऐसे पाए जाते हैं जिनका उस जीव के लिए कोई उपयोग नहीं होता।

ये अंग उस जीव के इतिहास की निशानियाँ हैं जिन्हें वह आज भी ढो रहा है। इन अंगों का उपयोग उस जीव के लिए विकासक्रम के किसी दौर में रहा होगा, लेकिन बदलते परिवेश और व्यवहार के कारण आज इनका उस जीव के लिए कोई उपयोग नहीं। जैसे एक बहुत अच्छा उदाहरण उन पक्षियों का जो उड़ने की योग्यता खो चुके हैं, जैसे शुतुरमुर्ग, एमु, पेंगुइन, कीवी इत्यादि।

इन सभी जीवों में पंख अथवा उनके अवशेष मौजूद हैं लेकिन ये उड़ने की योग्यता खो चुके हैं। आखिर कोई बुद्धिमान निर्माता किसी जीव को ऐसे अंग क्यों देगा जिनका उसके लिए कोई उपयोग नहीं? इसका जवाब भी हमें क्रमिक विकास में ही मिलता है।



बदलते परिवेश ने इन पक्षियों के लिए उड़ने की जरुरत को ख़त्म कर दिया लिहाजा इनके पंखों का विकास रुक गया। जैसे न्यूज़ीलैण्ड में पाये जाने वाले कीवी पक्षी के पूर्वज वे समुद्री पक्षी थे जो भूगर्भीय गतिविधियों के कारण समुद्र से बाहर आई इस भूमि पर उड़कर पहुंचे थे।

इस नयी भूमि पर न केवल भरपूर भोजन उपलब्ध था बल्कि उनके लिए कोई प्रतिस्पर्धा और शिकारी भी मौजूद नहीं था। ऐसे माहौल में वे बिना उड़े पूरा दिन जमीन पर कीड़े खाते हुए व्यतीत करते रह सकते थे।

ऐसा ही एक उदहारण गहरे समुद्र और अँधेरी गुफाओं में पाए जाने वाले जीवों के सम्बन्ध में दिया जा सकता है जो अपनी देखने की क्षमता खो चुके हैं परन्तु आज भी उनकी आँखों के अवशेष मौजूद हैं। आखिर किसी अंग की जरुरत ख़त्म होने पर उसका विकास किस प्रकार रुक जाता है?

असल में कोई अंग अथवा व्यवहार जब तक जीव के सर्वाइवल के लिए आवश्यक है प्राकृतिक चुनाव उसे संरक्षित रखता है। जैसे यदि जेनेटिक म्युटेशन के कारण कोई ऐसा कबूतर पैदा होता है जो कि उड़ने में सक्षम नहीं है तो वह सर्वाइव नहीं कर सकेगा और न ही अपनी संतति बढ़ा सकेगा।

लिहाजा इस म्युटेशन को बढ़ने का मौका नहीं मिलेगा। लेकिन किसी नए परिवेश में जहाँ उड़ना सर्वाइवल के लिए जरुरी न हो ऐसे में वह म्युटेशन फैलेगा। और समय समय पर ऐसे म्युटेशनस की वजह से वह अंग अथवा क्षमता प्रभावित होगी।

हम अपनी बात करें तो हमारे शरीर में भी बहुत सारे ऐसे अंग मौजूद हैं। जैसे अपेंडिक्स। अपेंडिक्स वास्तव में हमारी आंत का एक अवशेषी हिस्सा है जो अतीत में किसी समय कच्ची वनस्पति पचाने के काम आता था। लेकिन समय के साथ बदलते खान-पान ने इसकी उपयोगिता को समाप्त कर दिया।

आज यह एक अवशेषी अंग के रूप में हमारी आंत के सिरे पर मौजूद है और इसमें होने वाले इन्फेक्शन के कारण बहुत से लोगों को भयंकर पेट दर्द का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही अक्कल दाढ़, पूँछ कि हड्डी, साइनस, टॉन्सिल्स, कान को हिलाने वाली मांसपेशी, इरेक्टेर पिली(रोंगटे खड़े करने वाला तंत्र), आँखों के कोने पर पर पायी जाने वाली झिल्ली और 6 माह के बच्चों में पाया जाने वाला ग्रास्प रिफ्लेक्स( जिसके कारण बच्चा आपकी अंगुली को कसकर पकड़ लेता है) वास्तव में अतीत में इसी रिफ्लेक्स के कारण बच्चा अपनी माँ को कसकर पकड़े रहता था। आज भी बंदरों और वानरों में इस व्यवहार को देखा जा सकता है।

ये तो मात्र कुछ प्रमाण हैं। वास्तव में ऐसे प्रमाण इतनी अधिक संख्या में मौजूद हैं कि ऐसे तमाम प्रमाणों पर एक पूरी किताबों की सिरीज लिखी जा सकती है। ये सभी हमें बताते हैं कि कोई भी जीव किसी बुद्धिमान निर्माता द्वारा निर्मित रचना नहीं है बल्कि वह सुधारों की एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के कारण ही अपने वर्तमान स्वरुप में पहुंचा है।


Written by Arpit Dwivedi

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