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आउटबर्स्ट 2

 


क्यों मिलते हैं समुद्र में डूबे हुए शहर?

360 ईसा पूर्व में प्लेटो के लिखे 'डायलाॅग' में अटलांटिस का जिक्र मिलता है जो समुद्र में गर्क हो गया था। सदियों तक इस पर बात होती रही है और इसे एक माइथालाॅजिकल शहर माना जाता रहा है लेकिन 2009 के आसपास स्पेन के दक्षिण में एक समुद्र में डूबे शहर को खोजा गया था जिसके बारे में शोधकर्ताओं का मानना है कि यह वह खोया हुआ शहर अटलांटिस हो सकता है। हालांकि इस साईट के अटलांटिस होने की गारंटी नहीं है मगर एक यह हकीकत है कि कोई शहर था वहां, जो समुद्र में डूबा और ज्ञात इतिहास में उसका जिक्र नहीं मिलता।
1967-68 में ग्रीस के दक्षिण में मेडेटेरेनियन सी में एक डूबे हुए शहर की खोज की गयी थी, जिसे नाम दिया था पाउलोपेट्री, अनुमानन इसे पांच हजार साल पुराना बताया गया जो कि आगे पीछे भी हो सकता है। मेडेटेरेनियन के आसपास सबसे पुरानी आधुनिक आबादी बसती थी और उन्नत आबादी के इस तरह के ज्यादातर पुरातात्विक प्रमाण इसी क्षेत्र में मिलते हैं। मेडेटेरेनियन में ऐसी और भी साइटें खोजी गयी हैं।
ऐसा ही एक डूबा हुआ शहर द्वारका है, जो गुजरात के पश्चिम में अरब सागर में जलमग्न है और जिसका सही मायने में व्यापक सर्वेक्षण 2005 और 2007 में किया गया और करीब 200 अवशेष एकत्र किये गये जिसमें वहां मिले बर्तनों के बारे में अनुमान लगाया गया कि वे 3000 ईसापूर्व से 1528 ईसापूर्व के बीच के हो सकते हैं। हालांकि इस डूबे नगर की उम्र पर विवाद है और अगर आस्था वाले एंगल से हट कर सोचें तो एटलांटिस की तरह यहां भी गारंटी नहीं कि यह वही माइथालाॅजिकल द्वारका है मगर एक बात हकीकत है कि एक शहर था वहां जो शायद चार पांच हजार साल पहले डूब गया था।

इसी तरह 1987 में जापान के दक्षिण में रायक्यू आईलैंड के पास एक स्ट्रक्चर की खोज की गयी जो समुद्र में डूबा था और आकृति के हिसाब से एक बड़ा पिरामिड था। इसे जापानी अटलांटिस भी कहा गया पर नाम दिया गया योनागुनी मोनूमेंट, इसका फार्मेशन उत्तरी आयरलैंड के जायंट काॅजवे जैसा है। इसके बारे में एक थ्योरी यह भी है कि इसे वहां रहने वाली पैसिफिक सिविलाइजेशन के जोमां लोगों द्वारा बनाया गया जबकि कुछ लोग इसे नेचुरल फार्मेशन भी बताते हैं लेकिन यह जाहिरी तौर पर मानव निर्मित लगता है।
इसी तरह एक मरीन इंजीनियर पाउलीन जैलिट्ज्की और उनके पति पाॅल वींजवेग ने 2001 में क्यूबा के पास एक ऐसी ही साइट खोजी थी जो एक डूबे हुए शहर का पता देती थी। यहां भी कई पिरामिड और सर्कुलर स्ट्रक्चर के साथ मिश्रित ढांचे मिले हैं। कुछ शोधकर्ताओं के अनुमान से कभी क्यूबा और मैक्सिको के बीच इस जगह लैंड ब्रिज था जो बाद में पानी में डूब गया। यह ढांचे उन ढांचों से सिमिलर हैं जो मायन्स और एज्टेक लोगों ने बनाये थे जबकि कुछ साइंटिस्ट इसे प्राकृतिक और लाखों साल पुराना मानते हैं।
यह वे चर्चित साइटें हैं जो अब तक खोजी गयी हैं और जिनकी जांच पड़ताल की गयी, जबकि हो सकता है कि ऐसी बहुत सी साइटें अभी खोजे जाने का इंतजार कर रही हों.. इनकी एग्जेक्ट टाइमिंग पर बहस है मगर मोटे तौर पर इन्हें चार हजार साल पहले के आसपास का माना जा सकता है। बहरहाल इन समुद्र में डूबे शहरों से एक बात तो पता चलती है कि आज से हजारों साल पहले भी लोग समुद्र के किनारों पर नगरीय आबादियां बसा रहे थें जो कालांतर में जलमग्न हो गयीं। इसकी प्रमुख वजह समुद्र का बढ़ा जलस्तर हो सकता है लेकिन अगर इसे हिम युग की समाप्ति के हिसाब से जोड़ें तो यह दस हजार साल पुराने होने चाहिये जबकि यह बहुत बाद के हैं।


क्या इन सब तबाहियों के पीछे कोई सौर तूफ़ान था?

पिछली सदी में हालैंड में एक खोज हुई थी जमीन के अंदर दबी एक राख की लेयर की, जिसके बारे में तब आम मत था कि वह अतीत की किसी वाईल्ड फायर का नतीजा थी, फिर ऐसी ही लेयर अलग-अलग छः कांटीनेंट्स में 29 साइटों पर पाई गयी, और जिसे अमेरिका में क्लोविस लेयर या योरप में यूसेलो होराइजन कहा गया। फिर 2018 में ग्रीनलैंड में कुछ क्रेटर की खोज हुई और इसे लेकर एक कास्मिक इम्पैक्ट की थ्योरी पेश की गयी जिसे यंगर ड्रायस इम्पैक्ट हाइपोथेसिस कहा गया जिसके हिसाब से कुछ कामेट्स नार्थ अमेरिका या ग्रीनलैंड में पृथ्वी से टकराये थे और इसकी वजह से एक बड़ी तबाही ट्रिगर हुई थी।
उस वक्त सी लेवल बहुत नीचे था, ज्यादातर पानी बर्फ के रूप में जमा था और इस इम्पैक्ट से पैदा ऊर्जा ने बर्फ पिघला दी थी, ज्वालामुखी फूट पड़े थे, ज्यादातर पानी का वाष्पीकरण हो गया था जिसकी वजह से बाद में मुसलसल एसिड रेन हुई थी और सारे महाद्वीपीय किनारे डूब गये थे। इंसानी आबादियों का ज्यादातर हिस्सा खत्म हो गया था और ज्वालामुखियों से निकल कर वायुमंडल में पहुंची राख ही अमेरिका से आस्ट्रेलिया तक पहुंच कर बरसी थी जिससे वह लेयर बनी.. और संभवतः जिस विश्वव्यापी बाढ़ का जिक्र हम भिन्न संस्कृतियों में पाते हैं, उसकी वजह यही हो।
हालांकि बाद में जब यह पाया गया कि ज्यादातर सैम्पल की कार्बन डेटिंग इसे बारह हजार साल पहले की बता रही तो इन कहानियों को फिट करना मुश्किल हो गया। इसे उस दौर में हिम युग की समाप्ति का कारण जरूर माना जा सकता है.. उस वक्त ग्रीनलैंड और नार्थ अमेरिका एक ही थे और बर्फ से जमे थे, इस इम्पैक्ट ने ही वह बर्फ पिघलाई और उस दौरान ही मैमथ से ले कर सेबरटूथ तक विलुप्त हुए। बेतहाशा बढ़े सी लेवल ने तमाम किनारों को निगल लिया। अगर उस दौर में किनारे पर कोई आधुनिक नगर रहा होगा, तो उसका डूबना निश्चित था लेकिन इसकी गुंजाइश कम ही है क्योंकि शिकारी और भोजन संग्रहकर्ता सेपियंस ने स्थाई बस्तियां इसके बाद ही बसानी शुरू की थी।

अब पृथ्वी पर परग्रहियों के अस्तित्व को साबित करने में लगे कुछ शोधकर्ताओं ने इसी तर्ज पर एक और थ्योरी सामने रखी है.. हाई एनर्जी सोलर स्टार्म की, ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं। यह तो हम सबको पता है कि सूरज से इस किस्म के तूफान आते रहते हैं जिससे आमतौर पर हमारी मैगनेटोस्फियर और ओजोन हमें बचाते रहते हैं लेकिन अगर कभी इसकी तीव्रता बहुत ज्यादा हो तो इससे बचना मुश्किल है। इसके एक्स्ट्रीम रूप को निकोलस केज अभिनीत हालीवुड मूवी "नोइंग" में दिखाया गया है। यह शोधकर्ता इस सन फ्लेअर या सौर तूफान को उस लेवल का तो नहीं मानते पर यह आउटबर्स्ट इतना शक्तिशाली तो जरूर था कि इसने अपने केंद्र पर अच्छी खासी तबाही मचाई थी जो कि मिस्र और इंडस वैली के बीच होना चाहिये क्योंकि यहीं वह उन्नत आबादियां थीं जो लगभग एक समय ही इतिहास से गायब हो गयीं।
हो सकता है कि सूरज का असमान आचरण उस दौर में लंबे वक्त तक चला हो जिसने ग्लोब के अलग-अलग क्षेत्रों में सूखे, अकाल और बाढ़ की स्थिति बनाई हो और कुछ सी लेवल भी बढ़ाया हो लेकिन फिर सोलर फ्लेअर के फाईनल आउटबर्स्ट ने एकदम से वह इम्पैक्ट पैदा किया कि इससे बढ़ी गर्मी ने भी वही प्रभाव पैदा किया जो यंगर ड्रायस हाईपोथेसिस में सोचा गया था। इसने ग्लेशियरों को पिघला दिया, बड़े पैमाने पर पानी को वेपराईज कर दिया जिससे बाद में बेतहाशा बारिश हुई और ग्लेशियरों के पिघलने के कारण सी लेवल एकदम ऊपर उठ गया। उस वक्त जो किनारों पर नगरीय आबादियां थीं, वह इसकी चपेट में आ गयीं। जो इन क्षेत्रों में ज्वालामुखी रहे होंगे, वह भी एक्टिव हो गये होंगे। यह इम्पैक्ट भले कुछ मिनट या घंटों के लिये और एक खास क्षेत्र में रहा हो मगर इसका प्रभाव पूरे ग्लोब पर पड़ा और समुद्र का लेवल बढ़ने और बेतहाशा बारिश से लगभग सभी संस्कृतियों ने एक भयानक बाढ़ का सामना किया। ग्रेट स्फिंक्स के भी पानी में डूबे रहने के सबूत मिले हैं।
हड़प्पा के निचले क्षेत्र में बसा धोलावीरा समुद्र की भेंट चढ़ा होगा और बाद में कभी पानी उतरा होगा तो वह नमक का रेगिस्तान बन के रह गया। ऊपरी क्षेत्र के शहरों ने उस आग को झेला होगा और कुछ लोग बचे भी होंगे तो उन्होंने भूख और अकाल से दम तोड़ दिया होगा। उनकी तरह ही यह अजाब मिस्र के लोगों ने भी झेला होगा। अब उस वक्त भौगोलिक स्थितियां कितनी भी डांवाडोल और एक खास क्षेत्र के लिये विनाशकारी क्यों न हुई हों मगर बाकी आबादियों ने किसी तरह खुद को संभाला ही था और इस आपदा के गुजर जाने के बाद नई शुरुआत की थी। बाद में पानी वापस बर्फ के रूप में जमा होगा, समुद्र का लेवल कम हुआ भी होगा तो वह पहले जितना न हो पाया और अब तो लगातार बढ़ ही रहा है।
अब उस वक्त लोगों को कौन सा सौर तूफान या इसके इफेक्ट की समझ रही होगी। जिन्होंने डायरेक्ट झेला, वे गुजर गये और जिन्होंने इसके प्रभाव को झेला उन्हें बस बाढ़ समझ में आई और जब जनश्रुतियों में इसकी यादें संजोई गयीं तो ऐसे में बचाव का एकमात्र सहारा कश्ती ही समझ में आती है, और चूंकि अनदेखी ताकतों पर उन्हें विश्वास रहता था तो इसे ईश्वरीय शेड दे कर किसी अवतार पुरुष के हाथ बचाव की बागडोर थमा दी गयी, जो आगे चल कर कहानियों में दर्ज हो गयी। यूसेलो लेयर जैसी और भी परतें कहीं जमीन में दबी हो सकती हैं।
बहरहाल, यह सामने आई एक लेटेस्ट थ्योरी है जो सबसे सटीक लगती है, यंगर ड्रायस हाईपोथेसिस के मुकाबले.. क्योंकि वह जिस स्तर की तबाही की बात करती है, उस काल खंड में उतनी बड़ी तबाही के दूसरे सबूत नहीं मिलते जबकि इस थ्योरी के साथ इन तीनों सवालों के जवाब मिल सकते हैं कि गीजा जैसा पिरामिड बनाने वाली और साढ़े चार हजार साल पहले इंजीनियरिंग के हिसाब से शहर बसाने वाली उन दो उन्नत आबादियों के साथ क्या हुआ होगा.. कैसे ग्लोब के हर हिस्से में एक बहुत बड़ी बाढ़ की कहानी मिलती है और कैसे किनारों पर बसे वे आधुनिक नगर समुद्र में डूब गये। यह आज भी हो सकता है.. एक हाई एनर्जी वाला सौर तूफान पूरी दुनिया को ठीक इसी तर्ज पर प्रभावित कर सकता है बल्कि "Knowing" में दिखाये गये इफेक्ट की तरह पूरे प्लेनेट को भी खत्म कर सकता है।
तो जिस ग्लोबल बाढ़ का जिक्र लेख के शुरुआत में किया, वह यंगर ड्रायस इम्पैक्ट का परिणाम भी हो सकती है और इस बाद वाले आउटबर्स्ट का भी.. इनसे सम्बंधित कहानियां एक ही वक्त से ली गयी भी हो सकती हैं और इन दो अलग मौकों से भी ली गयी हो सकती हैं या किसी संस्कृति की कहानी बस एक रूपक के तौर पर भी रची गई हो सकती है। अभी तक यह दो थ्योरी आई हैं सामने, आगे हो सकता है कि कोई और भी आयें.. न पृथ्वी के अतीत पर होता शोध अभी थमा है और न अभी कोई फाइनल स्टैंड तय किया गया है। बस चीजें सामने रखी गयी हैं और यह आप पर निर्भर करता है कि आप क्या मानते हैं।

Written By Ashfaq Ahmad


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